दैनिक सद्विचार व पावन श्लोक (365 दिवस)

वर्ष के प्रत्येक दिन के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के पावन श्लोक, सरल हिंदी भावार्थ और जीवन में उतारने योग्य व्यावहारिक सीख।

कुल 365 श्लोक उपलब्ध • पृष्ठ 25 / 25
📅 दिवस 361 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 11.4 (आत्मसंयम)
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्।।11.4।।
भावार्थ: हे प्रभो ! मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है -- ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर ! आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा दीजिये।

[जीवन दृष्टि - आत्मसंयम]: व्यापक दृष्टि अहं को कम करती है और याद दिलाती है कि हमारी समझ पूरे सत्य का केवल एक हिस्सा है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

प्रतिक्रिया लेकर सुधार का एक कदम तय करें। (संदेश: तथ्यों से अपनी राय सुधारें — खासकर तब, जब कोई देख न रहा हो।)

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📅 दिवस 362 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 11.5 (ईमानदारी)
श्री भगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।।11.5।।
भावार्थ: श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! अब मेरे अनेक तरहके, अनेक अनेक वर्णों और आकृतियोंवाले सैकड़ों-हजारों दिव्यरूपोंको तू देख।

[जीवन दृष्टि - ईमानदारी]: व्यापक दृष्टि अहं को कम करती है और याद दिलाती है कि हमारी समझ पूरे सत्य का केवल एक हिस्सा है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

जो आपके नियंत्रण में है, उसे लिखकर एक कदम उठाएँ। (संदेश: तथ्यों से अपनी राय सुधारें — एक छोटे निर्णय से शुरुआत करें।)

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📅 दिवस 363 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 11.6 (धैर्य)
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्िवनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याऽश्चर्याणि भारत।।11.6।।
भावार्थ: हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! तू बारह आदित्योंको, आठ वसुओंको, ग्यारह रुद्रोंको और दो अश्विनीकुमारोंको तथा उनचास मरुद्गणोंको देख। जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं, ऐसे बहुत-से आश्चर्यजनक रूपोंको भी तू देख।

[जीवन दृष्टि - धैर्य]: व्यापक दृष्टि अहं को कम करती है और याद दिलाती है कि हमारी समझ पूरे सत्य का केवल एक हिस्सा है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

अति करने के बजाय संतुलित प्रतिक्रिया चुनें। (संदेश: तथ्यों से अपनी राय सुधारें — अपने कर्मों को बोलने दें।)

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📅 दिवस 364 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 11.7 (सेवा)
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि।।11.7।।
भावार्थ: हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन! मेरे इस शरीरके एक देशमें चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् को अभी देख ले। इसके सिवाय तू और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह भी देख ले।

[जीवन दृष्टि - सेवा]: व्यापक दृष्टि अहं को कम करती है और याद दिलाती है कि हमारी समझ पूरे सत्य का केवल एक हिस्सा है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

अपने कौशल से किसी दूसरे का काम आसान करें। (संदेश: तथ्यों से अपनी राय सुधारें — क्योंकि भरोसा रोज़ बनता है।)

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📅 दिवस 365 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 11.8 (सीखना)
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।11.8।।
भावार्थ: परन्तु तू अपनी इस आँखसे अर्थात् चर्मचक्षुसे मेरेको देख ही नहीं सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरी ईश्वर-सम्बन्धी सामर्थ्यको देख।

[जीवन दृष्टि - सीखना]: व्यापक दृष्टि अहं को कम करती है और याद दिलाती है कि हमारी समझ पूरे सत्य का केवल एक हिस्सा है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

आज किया गया एक छोटा वादा निभाएँ। (संदेश: तथ्यों से अपनी राय सुधारें — तुरंत परिणाम की जिद किए बिना।)

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