मित्रता
श्रीमद्भागवत का यह अमर प्रसंग द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण और उनके दरिद्र गुरुकुल-सखा सुदामा की पावन, निस्वार्थ और दिव्य मित्रता की पराकाष्ठा है। सुदामा एक अत्यंत विरक्त, संतोषी और विद्वान ब्राह्मण थे जो अपनी पत्नी सुशीला और बच्चों के साथ अत्यंत तंगहाली और दरिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे थे। जब घर में कई दिनों तक अन्न का एक दाना भी न रहा और बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे, तो पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर सुदामा अपने बालसखा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका के लिए निकले। भेंट स्वरूप देने के लिए उनके पास कुछ न था; पत्नी ने पड़ोस के चार घरों से भिक्षा माँगकर तीन मुट्ठी पुराने, टूटे हुए चिवड़ा (तंदुल) एक फटे हुए चीथड़े में बाँधकर दिए थे। फटे वस्त्रों और कांटों से लहूलुहान पैरों वाले सुदामा जब द्वारका के स्वर्ण-महल पहुँचे, तो द्वारपालों ने उन्हें भिखारी समझा। परंतु जैसे ही कन्हैया के कानों में 'सुदामा' नाम पड़ा, तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण अपने सिंहासन से नंगे पाँव दौड़ पड़े और द्वार पर खड़े सुदामा को अपनी छाती से लगा लिया। श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने स्वर्णिम पलंग पर बिठाया और उनके कांटों भरे पैरों को धोने के लिए जो जल मँगवाया था, वह रखा ही रह गया; कन्हैया के आंसुओं की अविरल धारा ने ही सुदामा के चरण पखार दिए। श्रीकृष्ण ने जब उस फटे चीथड़े में बंधे तंदुल को देखा, तो उन्होंने बड़े प्रेम से दो मुट्ठी चिवड़ा खाकर सुदामा को दो लोकों की संपूर्ण संपदा प्रदान कर दी। संकोचवश सुदामा ने मुँह से कुछ न माँगा और खाली हाथ लौट आए। परंतु जब वे अपने गाँव पहुँचे, तो अपनी टूटी झोपड़ी के स्थान पर इंद्रपुरी जैसी भव्य स्वर्ण-नगरी देखकर स्तब्ध रह गए। यह कथा सिखाती है कि सच्ची मित्रता में धन और पद का कोई भेद नहीं होता; वहाँ केवल निस्वार्थ प्रेम, आदर और आत्मीयता का वास होता है।