मित्रता
🎯 विषय स्तंभ / Category Hub 📚 22 सचित्र कहानियाँ

मित्रता

सच्चा मित्र वही है जो सुख में विनम्र रहे और विपत्ति में ढाल बनकर साथ निभाए। निस्वार्थ मित्रता जीवन की सबसे पावन धरोहर है।

✕ रीसेट
सभी कहानियाँ मित्रता अनुशासन व कर्तव्य साहस व निर्भयता सत्यनिष्ठा दया व परोपकार धैर्य व विनम्रता डिजिटल संस्कार पर्यावरण संरक्षण नागरिक कर्तव्य व सुरक्षा बुद्धि व विवेक समानता व समावेशन दया व करुणा
जिस दोस्त को थोड़ी दूरी चाहिए थी

जिस दोस्त को थोड़ी दूरी चाहिए थी

दो करीबी मित्र अवकाश के समय अलग-अलग चीज़ें चाहते हैं—एक साथ रहना चाहता है, जबकि दूसरे को कुछ शांत समय चाहिए। वे अपनी ज़रूरत विनम्रता से बताना, सीमाओं का सम्मान करना और दोस्ती व निजी समय दोनों के लिए व्यवस्था बनाना सीखते हैं।

खाली रंग का डिब्बा

खाली रंग का डिब्बा

कक्षा की सामूहिक चित्रकारी में एक ज़रूरी रंग का डिब्बा खाली मिलता है और काम रुकता हुआ लगता है। बच्चे रंग मिलाकर प्रयोग करते हैं और सीखते हैं कि अलग-अलग कौशल, विचार और तरीकों से हर कोई योगदान दे सकता है।

बिना बताए आया मेहमान

बिना बताए आया मेहमान

एक परिवार मेहमान का स्वागत करना चाहता है, लेकिन समय और भोजन सीमित हैं। वे जितना संभव है उतना करते हैं, अपनी सीमा विनम्रता से बताते हैं और बिना किसी को शर्मिंदा किए मिलने का दूसरा समय तय करते हैं।

खरीदने से पहले अदला-बदली

खरीदने से पहले अदला-बदली

नया खेल-सामान खरीदने से पहले बच्चे साफ़ और उपयोग योग्य वस्तुओं की सुरक्षित अदला-बदली आयोजित करते हैं और उनकी हालत व उपयुक्तता जाँचने पर सहमत होते हैं।

दो पुल, एक नदी

दो पुल, एक नदी

दो पड़ोसी बस्तियों में इस बात पर मतभेद होता है कि पहले किस पुल की मरम्मत हो। वे जोखिमों की तुलना करते हैं, अलग-अलग ज़रूरतें सुनते हैं और पारदर्शी योजना बनाते हैं।

वह बैठक जहाँ सब बोले

वह बैठक जहाँ सब बोले

मोहल्ले की बैठक में बार-बार केवल ऊँची आवाज़ वाले लोगों को सुना जाता है। एक युवा आयोजक पहले लिखने का समय और बोलने की बारी तय करता है, ताकि अधिक लोग योगदान दे सकें।

बंदर और मगरमच्छ

बंदर और मगरमच्छ

नर्मदा के सुरम्य तट पर जामुन के वृक्ष पर रहने वाले रक्तमुख बंदर और करालमुख मगरमच्छ में गहरी मित्रता थी। जब मगरमच्छ की पत्नी ने लोभवश बंदर का कलेजा खाने का हठ किया, तो मगरमच्छ मित्र को पीठ पर बैठाकर गहरे जल में ले गया। संकट को भाँपकर बंदर ने विचलित होने के बजाय शांत चित्त से कहा कि उसका कलेजा तो वृक्ष की कोटर में सुरक्षित रखा है। किनारे लौटते ही बंदर सुरक्षित शाखा पर कूद गया। यह कथा सिखाती है कि बुद्धि और आत्मसंयम से विकट संकट भी टल जाते हैं।

कछुआ और दो हंस

कछुआ और दो हंस

कंबुग्रीव नामक कछुए की मित्रता संकट और विकट नामक दो हंसों से थी। जब भीषण सूखे के कारण सरोवर सूखने लगा, तो हंसों ने कछुए को एक लकड़ी के बीच अपने मुँह से पकड़ने और हवा में उड़कर अमृत सरोवर ले जाने की योजना बनाई, परंतु मौन रहने की कड़ी शर्त रखी। नगर के ऊपर उड़ते समय जब लोगों के शोर पर कछुआ अपना संयम खोकर बोल पड़ा, तो वह नीचे गिर पड़ा। यह कथा सिखाती है कि मौन और आत्म-संयम ही जीवन की सबसे बड़ी ढाल हैं।

नीला सियार

नीला सियार

चंडराव नामक एक भूखा सियार भोजन की तलाश में नगर में कुत्तों से बचने के लिए नील के टब में गिर गया। नीले रंग में रँगकर जब वह वन में लौटा, तो उसने स्वयं को ब्रह्मा द्वारा नियुक्त वनराज घोषित कर सिंह और व्याघ्र को अपना सेवक बना लिया। परंतु जब एक रात सियारों के झुंड ने हुआँ-हुआँ किया, तो वह अपनी स्वाभाविक प्रकृति को रोक न सका और रँगे सियार की सच्चाई खुल गई। यह कथा सिखाती है कि छल और झूठा आवरण कभी स्थाई प्रतिष्ठा नहीं दे सकते।

शेर और चतुर खरगोश

शेर और चतुर खरगोश

भासुरक नामक अहंकारी और क्रूर शेर प्रतिदिन निर्दोष वनजीवों का संहार करता था। जीवों ने समझौते के तहत प्रतिदिन एक पशु भेजने का निर्णय लिया। जब एक छोटे से खरगोश की बारी आई, तो उसने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से शेर को एक गहरे कुएँ तक पहुँचाया और जल में उसका अपना ही प्रतिबिंब दिखाकर दूसरा शत्रु शेर बता दिया। क्रोध में अंधा होकर शेर कुएँ में कूद पड़ा और वन को भयमुक्त कर दिया। यह कथा सिखाती है कि बुद्धि और धैर्य के सम्मुख अपार बाहुबल भी पराजित हो जाता है।

चार मित्र

चार मित्र

चित्रांग नामक हिरन, लघुपतनक कौवा, मंथरक कछुआ और हिरण्यक मूषक—इन चार भिन्न स्वभाव के जीवों में अटूट मित्रता थी। जब हिरन शिकारी के फँदे में फँसा, तो कौवे ने सूचना दी, चूहे ने जाल काटा और कछुए ने संबल दिया। जब शिकारी ने कछुए को थैले में बाँध लिया, तो हिरन ने मृत होने का नाटक किया और कौवे ने आँखें कुरेदने का अभिनय किया। शिकारी के विचलित होते ही चूहे ने थैला काट दिया। यह अमर कथा सिखाती है कि सच्ची मित्रता और संगठन से दुर्बल जीव भी साक्षात यमराज तुल्य संकट पर विजय पा लेते हैं।

ब्राह्मण और नेवला

ब्राह्मण और नेवला

देवशर्मा नामक ब्राह्मण और उनकी पत्नी ने अपने नवजात शिशु के साथ एक अनाथ नेवले के बच्चे को बड़े वात्सल्य से पाला। एक दिन जब ब्राह्मण भिक्षाटन के लिए और ब्राह्मणी जल भरने कुएँ पर गई, तो एक विषैला काला नाग शिशु के पालने की ओर बढ़ा। नेवले ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर नाग के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जब ब्राह्मणी जल का घड़ा लेकर लौटी, तो उसने द्वार पर खून से सने मुख वाले नेवले को देखा। बिना सच्चाई जाने, घोर भ्रम और क्रोध में उसने भारी घड़ा नेवले पर दे मारा। अंदर जाकर जब उसने मरे हुए नाग और सुरक्षित खेलते बालक को देखा, तो उसके पश्चाताप का कोई पार न रहा। यह कथा सिखाती है कि बिना सोचे-समझे, क्रोध और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय जीवन भर का असहनीय संताप बन जाता है।

गाने वाला गधा

गाने वाला गधा

उद्धत नाम का एक धोबी का गधा दिन भर भारी कपड़ों का बोझ ढोता और रात में भोजन की तलाश में भटकता था। उसकी मित्रता एक चतुर सियार से हुई। दोनों रात में चुपके से पास के एक बड़े ककड़ी और तरबूज के खेत में घुसकर पेट भरते। एक चांदनी रात, पेट भर जाने पर गधे को अचानक संगीत की उमंग उठी और उसने सियार से कहा कि वह अपनी मधुर रागिनी में गीत गाएगा। सियार ने उसे बार-बार समझाया कि यह संगीत का स्थान और समय नहीं है; यहाँ केवल लाठियों से पहरा देने वाले किसान जाग जाएँगे। परंतु अहंकारी गधे ने सियार की विवेकपूर्ण सलाह को अपनी कला का अपमान समझा और ऊँचे स्वर में रेंकना शुरू कर दिया। सियार खेत की बाड़ फाँदकर भाग गया, जबकि किसानों ने डंडों से गधे की भारी दुर्गति की। यह कथा सिखाती है कि बुद्धिमान मित्रों की समयोचित सलाह न मानने और असमय प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति का अंत सदा उपहास और विनाश में होता है।

कौए और काला साँप

कौए और काला साँप

एक विशाल बरगद के वृक्ष पर एक कौए का युगल प्रेमपूर्वक घोंसला बनाकर रहता था। उसी वृक्ष की जड़ के खोखले तने में एक अत्यंत विषैला और क्रूर काला नाग आकर बस गया। जब भी कौवी अंडे देती, नाग ऊपर चढ़कर नवजात चूजों को खा जाता। अपार वेदना से संतप्त होकर कौए ने अपने बुद्धिमान मित्र सियार से सहायता माँगी। सियार ने समझाया कि शक्तिशाली शत्रु का सामना सीधे बाहुबल से नहीं, बल्कि कूटनीति और युक्ति से किया जाता है। सियार की योजना के अनुसार, कौआ राजमहल की सरोवर पर स्नान कर रही रानी का बहुमूल्य मोतियों का हार उठाकर उड़ गया और उसे नाग के बिल में गिरा दिया। सैनिकों ने बिल खोदकर हार निकाला और क्रूर नाग को मार गिराया। यह कथा सिखाती है कि युक्ति और चतुराई से बड़े से बड़े बलशाली और दुष्ट शत्रु को भी परास्त किया जा सकता है।

कबूतर और शिकारी का जाल

कबूतर और शिकारी का जाल

चित्रग्रीव नामक एक प्रतापी और अनुभवी कबूतरों के राजा अपने विशाल झुंड के साथ भोजन की तलाश में आकाश मार्ग से उड़ रहे थे। नीचे वन की भूमि पर प्रचुर मात्रा में बिखरे चावल के दानों को देखकर भूखे कबूतर नीचे उतरने के लिए लालायित हो उठे। चित्रग्रीव ने चेतावनी दी कि निर्जन वन में अचानक इतने चावल का होना किसी शिकारी के कपटपूर्ण जाल का संकेत है। परंतु एक उद्धत कबूतर के बहकावे में आकर सारा झुंड जमीन पर उतर गया और शिकारी के बिछाए महीन जाल में फँस गया। जब शिकारी डंडा लेकर दौड़ा, तो कबूतर घबराकर इधर-उधर फड़फड़ाने लगे। चित्रग्रीव ने धैर्य नहीं खोया और सबको एक ही दिशा और एक ही ताल में एक साथ पंख फड़फड़ाकर पूरा जाल लेकर उड़ने का आदेश दिया। सभी कबूतरों ने मिलकर जाल सहित उड़ान भरी और दूर जाकर अपने मित्र हिरण्यक चूहे की सहायता से जाल कटवाकर स्वतंत्रता प्राप्त की। यह कथा सिखाती है कि एकता और संगठित शक्ति में वह सामर्थ्य है जो असंभव संकट को भी पराजित कर देता है।

तीन मछलियाँ

तीन मछलियाँ

एक विशाल और शांत सरोवर में तीन मछलियाँ रहती थीं—अनागतविधाता (जो आने वाले संकट को पहले से भांपकर पूर्व तैयारी करती थी), प्रत्युत्पन्नमति (जो संकट उपस्थित होने पर तुरंत तीव्र बुद्धि से उपाय निकालती थी), और यद्भविष्य (जो केवल भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती थी)। एक संध्या, कुछ मछुआरों ने सरोवर के किनारे आकर योजना बनाई कि वे अगली सुबह जाल डालकर यहाँ की सभी मछलियों को पकड़ेंगे। अनागतविधाता ने उनकी बात सुनकर उसी रात एक छोटी नहर के मार्ग से दूसरे गहरे जलाशय में प्रस्थान कर लिया। अगली सुबह जब मछुआरों ने जाल फेंका, तो प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य दोनों जाल में फँस गईं। प्रत्युत्पन्नमति ने तुरंत मृत होने का स्वांग रचा और जैसे ही मछुआरों ने उसे मरा समझकर किनारे पर फेंका, वह छलाँग मारकर गहरे पानी में चली गई। परंतु केवल भाग्य पर निर्भर रहने वाली यद्भविष्य जाल में तड़पती रही और मछुआरों द्वारा काट डाली गई। यह कथा सिखाती है कि पूर्व तैयारी और त्वरित बुद्धि ही जीवन बचाती है; भाग्य के भरोसे आलस्य करने वाले का विनाश निश्चित है।

हंस और उल्लू

हंस और उल्लू

मानसरोवर के पवित्र जल में रहने वाले एक सुंदर और शांत राजहंस की भेंट वन के एक अंधकारप्रिय उल्लू से हुई। उल्लू ने अत्यधिक मीठी बातों और चापलूसी से हंस को मोहित कर लिया और उसे अपने घने, अंधेरे खोखले वृक्ष में अतिथि बनने का निमंत्रण दिया। राजहंस ने कुसंगति के स्वभाव को अनदेखा कर उसका आतिथ्य स्वीकार कर लिया। जब रात्रि में एक शिकारी वृक्ष के नीचे विश्राम करने आया, तो उल्लू ने अपनी अमंगलकारी कर्कश ध्वनि निकाली। उल्लू की आवाज सुनकर क्रुद्ध शिकारी ने तीर चढ़ाया। ध्वनि करते ही उल्लू तो फुर्ती से अपने गहरे खोखल में छिप गया, परंतु भोला राजहंस वृक्ष की डाल पर ही बैठा रहा। शिकारी का बाण सीधे हंस के सीने में जा लगा। यह कथा सिखाती है कि चापलूसी से प्रभावित होकर अयोग्य और विपरीत स्वभाव वाले की संगति करना प्राणघाती सिद्ध होता है।

हाथी और गौरैया

हाथी और गौरैया

एक घने अरण्य में एक विशाल वटवृक्ष पर गौरैया युगल ने अपना घोंसला बनाया था, जिसमें नन्हें अंडे रखे थे। एक दिन मदमस्त और घमंडी हाथी ने प्रचंड गर्मी से व्याकुल होकर वृक्ष की उसी विशाल शाखा को अपनी भारी सूंड से मरोड़कर तोड़ दिया। घोंसला टूट गया और सभी अंडे नष्ट हो गए। असहाय गौरैया युगल विलाप करने लगा। अपने मित्रों—कठफोड़वा (पक्षराज), वीणावदना मक्खी और मेंढक मेघनाद—के साथ मिलकर गौरैया ने न्याय पाने की एक अद्भुत रणनीति बनाई। मक्खी ने हाथी के कानों में मधुर गुंजन कर उसे मदहोश किया, कठफोड़वे ने उसकी दोनों आँखें फोड़ दीं, और मेंढक ने दलदल के पार टर्राकर अंधे हाथी को जल का भ्रम करा दिया। प्यासा हाथी गड्ढे और दलदल में गिरकर समाप्त हो गया। यह कथा सिखाती है कि संगठित होकर छोटे और निर्बल जीव भी बड़े से बड़े अहंकारी और अन्यायी अत्याचारी को परास्त कर सकते हैं।

सुदामा और श्रीकृष्ण की पावन मित्रता

सुदामा और श्रीकृष्ण की पावन मित्रता

श्रीमद्भागवत का यह अमर प्रसंग द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण और उनके दरिद्र गुरुकुल-सखा सुदामा की पावन, निस्वार्थ और दिव्य मित्रता की पराकाष्ठा है। सुदामा एक अत्यंत विरक्त, संतोषी और विद्वान ब्राह्मण थे जो अपनी पत्नी सुशीला और बच्चों के साथ अत्यंत तंगहाली और दरिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे थे। जब घर में कई दिनों तक अन्न का एक दाना भी न रहा और बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे, तो पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर सुदामा अपने बालसखा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका के लिए निकले। भेंट स्वरूप देने के लिए उनके पास कुछ न था; पत्नी ने पड़ोस के चार घरों से भिक्षा माँगकर तीन मुट्ठी पुराने, टूटे हुए चिवड़ा (तंदुल) एक फटे हुए चीथड़े में बाँधकर दिए थे। फटे वस्त्रों और कांटों से लहूलुहान पैरों वाले सुदामा जब द्वारका के स्वर्ण-महल पहुँचे, तो द्वारपालों ने उन्हें भिखारी समझा। परंतु जैसे ही कन्हैया के कानों में 'सुदामा' नाम पड़ा, तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण अपने सिंहासन से नंगे पाँव दौड़ पड़े और द्वार पर खड़े सुदामा को अपनी छाती से लगा लिया। श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने स्वर्णिम पलंग पर बिठाया और उनके कांटों भरे पैरों को धोने के लिए जो जल मँगवाया था, वह रखा ही रह गया; कन्हैया के आंसुओं की अविरल धारा ने ही सुदामा के चरण पखार दिए। श्रीकृष्ण ने जब उस फटे चीथड़े में बंधे तंदुल को देखा, तो उन्होंने बड़े प्रेम से दो मुट्ठी चिवड़ा खाकर सुदामा को दो लोकों की संपूर्ण संपदा प्रदान कर दी। संकोचवश सुदामा ने मुँह से कुछ न माँगा और खाली हाथ लौट आए। परंतु जब वे अपने गाँव पहुँचे, तो अपनी टूटी झोपड़ी के स्थान पर इंद्रपुरी जैसी भव्य स्वर्ण-नगरी देखकर स्तब्ध रह गए। यह कथा सिखाती है कि सच्ची मित्रता में धन और पद का कोई भेद नहीं होता; वहाँ केवल निस्वार्थ प्रेम, आदर और आत्मीयता का वास होता है।

साझा प्रयास की ऐतिहासिक जीत

साझा प्रयास की ऐतिहासिक जीत

जिला फुटबॉल चैंपियनशिप के फाइनल मुकाबले में नवोदय विद्यालय का स्टार स्ट्राइकर विवान अपने व्यक्तिगत रिकॉर्ड और खेल पत्रकारों की वाहवाही के नशे में चूर था। वह मैदान पर किसी साथी को पास नहीं देता था और अकेले ही गेंद को गोल पोस्ट तक ले जाने की हठधर्मी करता था। विरोधी टीम 'ईगल क्लब' के चालाक कोच ने विवान की इस कमजोरी को भांप लिया और मध्यांतर से पहले विवान को तीन मजबूत रक्षकों के घेरे में फंसाकर नवोदय विद्यालय पर दो शानदार गोल दाग दिए। पहले हाफ की समाप्ति पर नवोदय विद्यालय 0-2 से पीछे था और टीम के सभी खिलाड़ी विवान के स्वार्थी खेल से निराश होकर अपना मनोबल खो चुके थे। लॉकर रूम में कोच ने विवान को एक टूटा हुआ तीर और तीरों का एक मजबूत गट्ठा थमाते हुए कहा—'अकेला खिलाड़ी चाहे मेसी या रोनाल्डो जैसा हो, वह एक अनुशासित और एकजुट टीम को कभी नहीं हरा सकता। तुम्हारी व्यक्तिगत चमक टीम की हार की कीमत पर नहीं चमक सकती।' कोच के इस कटु सत्य ने विवान के अहंकार को झकझोर दिया। दूसरे हाफ में विवान ने अपने अहंकार को तिलांजलि देकर पूरी तरह टीम भावना से खेला; उसने विरोधी रक्षकों को अपनी ओर आकर्षित किया और खाली खड़े अपने विंगर्स आदित्य और समीर को जादुई पास दिए। नवोदय विद्यालय ने अंतिम बीस मिनटों में लगातार तीन दर्शनीय गोल करके मैच 3-2 से जीत लिया। ट्रॉफी उठाते समय विवान ने वह कप पूरी टीम के हाथों में सौंपते हुए स्वीकार किया कि कोई भी महान विजय अकेले नहीं, केवल साझा समर्पण और एकजुटता से ही जीती जा सकती है।

मतभेद के बाद भी प्रगाढ़ मित्रता

मतभेद के बाद भी प्रगाढ़ मित्रता

विवेकानंद विद्यालय की वार्षिक पत्रिका के मुख्य संपादकीय पृष्ठ के लिए सर्वश्रेष्ठ निबंध चुनने को लेकर दो अभिन्न मित्रों, सिद्धार्थ और निखिल, के बीच एक तीखा बौद्धिक मतभेद उत्पन्न हो गया। सिद्धार्थ का मानना था कि पत्रिका का मुख्य विषय पारंपरिक अकादमिक अध्ययन और परीक्षाओं में श्रेष्ठता होना चाहिए, जबकि निखिल का तर्क था कि आधुनिक समय में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, रचनात्मक कलाओं और व्यावहारिक जीवन-कौशलों पर बल दिया जाना चाहिए। संपादकीय बैठक में दोनों के बीच तर्क इतने उग्र हो गए कि व्यक्तिगत आक्षेप शुरू हो गए और दस वर्षों की घनिष्ठ मित्रता एक ही झटके में टूटती दिखाई देने लगी। दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया और विद्यालय के अन्य छात्र उनके अलगाव का तमाशा देखने लगे। उस शाम अपने अध्ययन कक्ष में बैठे सिद्धार्थ ने जब निखिल द्वारा लिखे गए तर्कों को ठंडे दिमाग से पुनः पढ़ा, तो उसे अनुभव हुआ कि निखिल की बातों में गहरा सत्य और संवेदनशीलता थी। सिद्धार्थ ने अपने अहंकार को किनारे रखा और रात के आठ बजे दो कुल्हड़ गर्म चाय लेकर निखिल के घर जा पहुँचा। दोनों मित्रों ने अपने गिले-शिकवे भुलाकर गले मिले और यह स्वीकार किया कि विचारों में भिन्नता का अर्थ दिलों में शत्रुता नहीं होता। उन्होंने दोनों दृष्टिकोणों को मिलाकर 'सर्वांगीण शिक्षा और मानसिक संतुलन' पर एक ऐसा संयुक्त संपादकीय लिखा जिसने राज्य स्तर पर सर्वश्रेष्ठ छात्र आलेख का पुरस्कार जीता। यह कथा सिखाती है कि परिपक्व मित्रता विचारों के मतभेद से ऊपर होती है; स्वस्थ विमर्श रिश्तों को तोड़ता नहीं, बल्कि उन्हें और अधिक परिपक्व और प्रगाढ़ बनाता है।

सच्चा मित्र और जंगल का भालू

सच्चा मित्र और जंगल का भालू

दो मित्रों, रोहन और सोहन की कहानी, जिन्होंने जंगल में भालू का सामना किया और जाना कि विपत्ति में साथ निभाने वाला ही सच्चा मित्र होता है।