📅 दिवस 241 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.18 (ज्ञानविज्ञानयोग)
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।7.18।।
भावार्थ: ये सभी (चारों प्रकार के भक्त) उदार (श्रेष्ठ) ही हैं, परंतु ज्ञानी तो साक्षात मेरा अपना ही स्वरूप है—ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मुझमें ही मन-बुद्धि लगाकर मुझे ही अपनी सर्वोच्च गति मानकर स्थित है।
भगवान कितने विशाल हृदय हैं कि वे अपनी ओर आने वाले हर व्यक्ति को 'उदार' कहते हैं, चाहे वह किसी स्वार्थ से ही क्यों न आया हो। लेकिन जो व्यक्ति ईश्वर को केवल बाहर नहीं बल्कि अपने भीतर पहचान लेता है, वह परमात्मा से अलग नहीं रहता, वह स्वयं ईश्वरीय स्वरूप हो जाता है।
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आज दूसरों की छोटी-मोटी गलतियों या स्वार्थों को देखकर दिल छोटा न करें; भगवान की तरह उदार बनें और सबको गले लगाएं।
📌 प्रेरक संदेश:
विशाल हृदय वाला ही महान बनता है; संकीर्णता मन की दरिद्रता है। उदाहरण: स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में जब 'मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनो' कहा, तो उनके विशाल और उदार हृदय ने पूरे विश्व को अपना परिवार बना लिया।
📅 दिवस 242 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.19 (ज्ञानविज्ञानयोग)
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।।
भावार्थ: अनेक जन्मों के अंतिम जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त हुआ पुरुष 'सब कुछ परमात्मा (वासुदेव) ही है'—इस भाव से मेरी शरण में आता है; ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
यह भारतीय दर्शन का सर्वोच्च शिखर है—'वासुदेवः सर्वम्' अर्थात जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, हर प्राणी, हर परिस्थिति, हर कण परमात्मा का ही विस्तार है। जब यह दृष्टि जगती है, तो किसी से नफरत करना असंभव हो जाता है। ऐसी चेतना तक पहुंचना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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आज दिनभर जब भी किसी इंसान या परिस्थिति से सामना हो, तो मन में दोहराएं: 'इसमें भी वही ईश्वर है' और कटुता की जगह प्रेम से पेश आएं।
📌 प्रेरक संदेश:
जब सबमें ईश्वर दिखेगा, तो सारा संसार अपना लगेगा। उदाहरण: संत तुकाराम जी को जब किसी ने गालियां दीं, तो उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—'प्रभु, आज आपने इस रूप में दर्शन दिए'; ऐसी समदृष्टि ही इंसान को महात्मा बनाती है।
📅 दिवस 243 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.20 (ज्ञानविज्ञानयोग)
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।।7.20।।
भावार्थ: जिनका ज्ञान उन-उन सांसारिक भोग-वासनाओं द्वारा छीना जा चुका है, वे लोग अपने-अपने स्वभाव से विवश होकर उन-उन नियमों का पालन करते हुए अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।
जब मनुष्य के मन पर लोभ, अंधविश्वास और तुरंत फायदा पाने की लालसा हावी हो जाती है, तो उसकी बुद्धि काम करना बंद कर देती है। वह तांत्रिकों, अंधविश्वासों और शॉर्टकट रास्तों के चक्कर में अपनी ऊर्जा बर्बाद करता है, जबकि असली समाधान अपने चरित्र को शुद्ध करना है।
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आज किसी भी अंधविश्वास, ताबीज, टोटके या 'रातों-रात अमीर बनने' के शॉर्टकट के लालच में न आएं; केवल सत्य, कर्म और परमात्मा पर भरोसा रखें।
📌 प्रेरक संदेश:
अंधविश्वास कमजोर मन की उपज है; विवेक और मेहनत ही सच्चा धर्म है। उदाहरण: एक छात्र जो परीक्षा के लिए पढ़ाई करने के बजाय किसी ताबीज या टोटके के भरोसे बैठता है, वह असफल ही होता है; कर्म ही सबसे बड़ा देवता है।
📅 दिवस 244 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.21 (ज्ञानविज्ञानयोग)
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।7.21।।
भावार्थ: जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की उस देवता के प्रति श्रद्धा को मैं ही स्थिर और दृढ़ करता हूँ।
परमात्मा सभी रूपों और नामों से परे है, लेकिन वह हर व्यक्ति की सच्ची आस्था का सम्मान करता है। कोई भगवान को राम, कृष्ण, शिव, अल्लाह या ईसा के रूप में पुकारे—ईश्वर उसकी भावना को स्वीकार करता है। इसलिए दूसरों की आस्था का उपहास कभी न करें।
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आज किसी भी धर्म, संप्रदाय या पूजा-पद्धति की निंदा न करें; सभी आस्थाओं के पीछे छिपे ईश्वर के प्रति सम्मान का भाव रखें।
📌 प्रेरक संदेश:
नदियां अनेक हैं पर वे एक ही समुद्र में मिलती हैं; धर्म के नाम पर नफरत अज्ञानता है। उदाहरण: रामकृष्ण परमहंस ने हिंदू, इस्लाम और ईसाई धर्म की साधना करके यह सिद्ध किया था कि सभी मार्ग अंततः एक ही सच्चिदानंद परमात्मा तक ले जाते हैं।
📅 दिवस 245 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.22 (ज्ञानविज्ञानयोग)
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।।7.22।।
भावार्थ: वह मनुष्य उस दृढ़ श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की आराधना करता है और उससे अपनी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करता है; परंतु वास्तव में वे सभी भोग मेरे द्वारा ही निश्चित किए हुए प्राप्त होते हैं।
संसार में हमें जो भी सुख, साधन, पद या मदद किसी व्यक्ति या माध्यम से मिलती है, वह वास्तव में उस परमात्मा की ही कृपा का माध्यम है। जब हमें यह पता चलता है कि दाता केवल एक ही है, तो हम बिचौलियों के आगे गिड़गिड़ाना छोड़ देते हैं और सीधे मूल स्रोत से जुड़ते हैं।
🎯
आज जब भी कोई आपकी मदद करे या कोई सफलता मिले, तो उस व्यक्ति को धन्यवाद देने के साथ-साथ ईश्वर को भी धन्यवाद दें जिन्होंने उन्हें माध्यम बनाया।
📌 प्रेरक संदेश:
नल से पानी आता है लेकिन पानी का स्रोत पहाड़ और बादल हैं; असली दाता को कभी न भूलें। उदाहरण: जैसे बगीचे का माली पौधों को पानी देता है, पर उनमें फल और फूल पैदा करने की जीवन-शक्ति परमात्मा ही देता है।
📅 दिवस 246 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.23 (ज्ञानविज्ञानयोग)
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।7.23।।
भावार्थ: परंतु उन अल्पबुद्धि (कम समझ वाले) मनुष्यों का वह फल नाशवान होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे भी भजें, अंत में मुझको ही प्राप्त होते हैं।
छोटी सोच वाला इंसान छोटी-मोटी नश्वर चीजें मांगता है—कार, बंगला, तारीफ—जो कुछ समय बाद पुरानी होकर खत्म हो जाती हैं। लेकिन जो प्रबुद्ध इंसान है, वह शाश्वत शांति, प्रेम और ईश्वर को मांगता है। अपने लक्ष्यों को बड़ा और अमर बनाइए।
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आज अपने लक्ष्यों की समीक्षा करें: क्या आप केवल ऐसी चीजों के पीछे भाग रहे हैं जो कल नष्ट हो जाएंगी? अपने जीवन में ज्ञान और चरित्र जैसी शाश्वत संपदा को प्राथमिकता दें।
📌 प्रेरक संदेश:
रेत के महल बनाने में समय मत गंवाइए; ऐसा चरित्र बनाइए जो समय की आंधी में भी अटल रहे। उदाहरण: सिकंदर ने पूरी दुनिया की दौलत जीती पर मरते समय हाथ खाली रह गए; जबकि बुद्ध और कबीर के विचार आज हजारों साल बाद भी मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
📅 दिवस 247 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.24 (ज्ञानविज्ञानयोग)
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।7.24।।
भावार्थ: बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परम दिव्य भाव को न जानते हुए, मुझ निराकार, सर्वव्यापी और इंद्रियातीत परमात्मा को केवल साधारण मनुष्य की भांति देहधारी मान बैठते हैं।
परमात्मा को केवल एक व्यक्ति, मूर्ति या सीमित रूप मान लेना हमारी समझ की कमी है। ईश्वर संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त चेतना है। जब हम सत्य को संकीर्ण सीमाओं से बाहर निकालकर अनंत रूप में देखते हैं, तो हमारी सोच भी विशाल और उदार हो जाती है।
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आज ईश्वर को केवल किसी मंदिर की मूर्ति तक सीमित न समझें; सोचें कि वह आपके भीतर, आपके काम में और आपके आसपास के हर व्यक्ति में साक्षात विद्यमान है।
📌 प्रेरक संदेश:
ईश्वर किसी कमरे या मूर्ति में बंद नहीं है; वह कण-कण में समाया हुआ जीवन है। उदाहरण: जैसे बिजली को कोई देख नहीं सकता पर पंखे और बल्ब में उसकी शक्ति काम करती दिखती है, वैसे ही निराकार ईश्वर पूरी सृष्टि का संचालन कर रहा है।
📅 दिवस 248 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.25 (ज्ञानविज्ञानयोग)
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।7.25।।
भावार्थ: अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके सामने प्रत्यक्ष नहीं होता; इसलिए यह अज्ञानी संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी परमेश्वर को भली-भांति नहीं पहचान पाता।
जैसे सूर्य के आगे बादल आ जाएं तो वह दिखाई नहीं देता, वैसे ही अहंकार, काम और लोभ के पर्दे के कारण ईश्वर हमें दिखाई नहीं देता। जो व्यक्ति अपने भीतर से घमंड और वासना के पर्दे को हटा देता है, उसके सामने सत्य सूर्य की तरह चमकने लगता है।
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आज अपने मन से 'मैं सब जानता हूँ' का अहंकार निकालें; एक विनम्र शिक्षार्थी बनकर सत्य और सद्गुणों को ग्रहण करें।
📌 प्रेरक संदेश:
घमंड का चश्मा हटाएंगे तभी सत्य का दीदार होगा। उदाहरण: एक भरे हुए प्याले में और चाय नहीं डाली जा सकती; इसी तरह जिसका दिमाग अहंकार से भरा है, उसमें ज्ञान और ईश्वर का प्रकाश नहीं उतर सकता।
📅 दिवस 249 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.26 (ज्ञानविज्ञानयोग)
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।7.26।।
भावार्थ: हे अर्जुन! पूर्वकाल में बीत चुके, वर्तमान में मौजूद और भविष्य में होने वाले संपूर्ण प्राणियों को मैं जानता हूँ; परंतु मुझको कोई भी (अपनी सीमित बुद्धि से) पूरी तरह नहीं जानता।
मनुष्य केवल आज की सोच पाता है और कल की चिंता में घुलता रहता है। लेकिन वह परम शक्ति भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को एक साथ देखती है। जब हम यह समझ लेते हैं कि ब्रह्मांड की बागडोर उस सर्वज्ञ शक्ति के हाथ में है, तो हमारी भविष्य की व्यर्थ चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।
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आज भविष्य की अनावश्यक चिंताओं और आशंकाओं को छोड़कर केवल अपने वर्तमान कर्तव्य को पूरी ईमानदारी से निभाएं; ब्रह्मांडीय व्यवस्था पर विश्वास रखें।
📌 प्रेरक संदेश:
कल क्या होगा यह ईश्वर जानता है, आज क्या करना है यह आपका धर्म है। उदाहरण: एक हवाई जहाज का यात्री पायलट की क्षमता पर भरोसा करके आराम से सो जाता है; इसी तरह जीवन के विमान को चलाने वाले ईश्वर पर भरोसा रखें।
📅 दिवस 250 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.27 (ज्ञानविज्ञानयोग)
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।7.27।।
भावार्थ: हे भरतवंशी परंतप अर्जुन! संसार में इच्छा (राग) और द्वेष (नफरत) से पैदा होने वाले सुख-दुःख आदि द्वंद्वों के मोह से संपूर्ण प्राणी जन्म से ही अत्यंत अज्ञान और भ्रम को प्राप्त हो रहे हैं।
हमारी सारी मानसिक बीमारियां केवल दो शब्दों से पैदा होती हैं: 'राग' (यह मुझे चाहिए ही चाहिए) और 'द्वेष' (यह मुझे बिल्कुल नहीं चाहिए)। जब हम इन दोनों के झूले में झूलते रहते हैं, तो हमारा विवेक नष्ट हो जाता है। जो इन दोनों से ऊपर उठकर निष्पक्ष रहता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
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आज यदि कोई काम आपकी पसंद के अनुसार न हो, तो गुस्सा होने या चिढ़ने के बजाय शांत मन से उसे स्वीकार करें और जो सही हो वही करें।
📌 प्रेरक संदेश:
पसंद और नापसंद के गुलाम मत बनिए; विवेक के मालिक बनिए। उदाहरण: एक कुशल डॉक्टर मरीज की बीमारी को देखकर न नफरत करता है न आकर्षित होता है, वह निष्पक्ष भाव से केवल सही इलाज करता है; जीवन को इसी दृष्टि से जिएं।
📅 दिवस 251 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.28 (ज्ञानविज्ञानयोग)
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।7.28।।
भावार्थ: परंतु जिन पुण्यकर्मी मनुष्यों के पाप कर्म नष्ट हो चुके हैं, वे राग-द्वेष रूपी द्वंद्वों के मोह से सर्वथा मुक्त होकर दृढ़ संकल्प के साथ मेरी भक्ति और साधना में लगे रहते हैं।
जब तक इंसान छल, कपट और अनैतिक काम करता रहेगा, उसका मन कभी स्थिर नहीं हो सकता। जब हम दूसरों की सेवा, ईमानदारी और परोपकार (पुण्य कर्म) करते हैं, तो हमारे मन का मैल धुल जाता है और जीवन में अटूट मानसिक दृढ़ता और स्पष्टता आ जाती है।
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आज कोई ऐसा पुण्य कर्म करें जिससे किसी असहाय के चेहरे पर मुस्कान आए; सच्चाई और निष्ठा से किए गए काम से अपने अंतर्मन को हल्का करें।
📌 प्रेरक संदेश:
पाप मन को अशांत और कमजोर बनाता है, पुण्य मन को निर्भय और मजबूत बनाता है। उदाहरण: एक व्यक्ति जो अपनी कमाई से गुप्त रूप से किसी गरीब अनाथ का इलाज कराता है, उसके मन में जो गहरी शांति और आत्मविश्वास आता है, उसे दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती।
📅 दिवस 252 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.29 (ज्ञानविज्ञानयोग)
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।7.29।।
भावार्थ: जो मनुष्य बुढ़ापे और मृत्यु के दुःखों से मुक्ति पाने के लिए केवल मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे उस परब्रह्म को, संपूर्ण अध्यात्म (आत्म-तत्व) को और संपूर्ण कर्म को भली-भांति जान लेते हैं।
बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु इस संसार की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाइयां हैं जिनसे कोई नहीं बच सकता। जो व्यक्ति केवल ऊपरी साज-सज्जा में समय गंवाने के बजाय अपनी आत्मा के अमर स्वरूप को खोजने का प्रयास करता है, वह जीवन और मृत्यु के सारे रहस्यों को समझकर निर्भय हो जाता है।
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आज इस सत्य को याद करें कि यह शरीर नश्वर है और एक दिन छूटेगा; इसलिए शरीर के सुखों में अंधे होने के बजाय अपनी आत्मा की अमर पूंजी (ज्ञान व दया) को बढ़ाएं।
📌 प्रेरक संदेश:
मृत्यु की याद ही जीवन को सबसे ज्यादा सार्थक और नैतिक बनाती है। उदाहरण: राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) ने जब एक बीमार, एक वृद्ध और एक शव को देखा, तो उन्होंने जीवन के इस मूल सत्य को समझा और सत्य की खोज में निकलकर बुद्ध बन गए।
📅 दिवस 253 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 7.30 (ज्ञानविज्ञानयोग)
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।।7.30।।
भावार्थ: जो मनुष्य अधिभूत (भौतिक जगत), अधिदैव (दैवीय शक्तियां) और अधियज्ञ (यज्ञ व त्याग) सहित मुझ परमात्मा को जानते हैं, वे योगयुक्त चित्त वाले मनुष्य मृत्यु के अंतिम समय में भी मुझको ही जानते हैं (मुझमें ही लीन रहते हैं)।
जिसने अपने पूरे जीवन को एक यज्ञ (परोपकार व त्याग) बना लिया है और जो प्रकृति तथा परमात्मा के नियमों को समझ चुका है, वह मृत्यु के समय भी भयभीत या व्याकुल नहीं होता। उसका अंत भी उतना ही शांत और आनंदमय होता है जितना उसका जीवन था।
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आज अपने हर कर्म को समाज और ईश्वर के लिए एक पावन आहुति समझकर करें; जब जीवन में कोई पछतावा नहीं होता, तो मन में कोई डर भी नहीं होता।
📌 प्रेरक संदेश:
जिसका जीवन पवित्र है, उसकी मृत्यु भी एक उत्सव बन जाती है। उदाहरण: सुकरात को जब अन्यायपूर्वक जहर का प्याला दिया गया, तो उन्होंने बिना किसी भय या द्वेष के मुस्कुराते हुए उसे पिया; क्योंकि उनकी आत्मा सत्य में अडिग थी।
📅 दिवस 254 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 8.1 (अक्षरब्रह्मयोग)
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।।8.1।।
भावार्थ: अर्जुन ने पूछा: हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसे कहा जाता है?
ज्ञान की शुरुआत सही प्रश्नों से होती है। जो व्यक्ति जीवन के मूल तत्वों (ब्रह्म, आत्मा, कर्म) के बारे में गंभीर प्रश्न नहीं पूछता, वह केवल सतह पर तैरता रहता है। अर्जुन की तरह एक सच्चा जिज्ञासु बनकर जीवन के रहस्यों को समझने की प्यास ही मनुष्य को ऊंचा उठाती है।
🎯
आज दिनभर की भागदौड़ में 10 मिनट निकालकर खुद से यह गंभीर प्रश्न पूछें: 'मैं वास्तव में कौन हूँ? मेरे जीवन का असली उद्देश्य और कर्म क्या है?'
📌 प्रेरक संदेश:
जो प्रश्न नहीं पूछता वह कभी नहीं सीखता; सच्ची जिज्ञासा ही ज्ञान की जननी है। उदाहरण: अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था—'मुझमें कोई विशेष प्रतिभा नहीं है, मैं तो केवल जुनून की हद तक जिज्ञासु हूँ'; सही सवाल पूछने से ही क्रांतियां होती हैं।
📅 दिवस 255 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 8.2 (अक्षरब्रह्मयोग)
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।8.2।।
भावार्थ: हे मधुसूदन! यहां इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और वह किस प्रकार रहता है? तथा जीवन के अंतिम समय में (प्रयाणकाल में) नियंत्रित मन वाले साधकों द्वारा आप किस प्रकार जानने में आते हैं?
जीवन का अंतिम क्षण हमारे पूरे जीवन की कमाई का निचोड़ होता है। जो इंसान पूरे जीवन में मन को वश में रखने का अभ्यास नहीं करता, वह अंत समय में भय, मोह और पीड़ा से तड़पता है। आत्म-संयमी व्यक्ति जीवनभर तैयारी करता है ताकि उसका अंतिम प्रस्थान गरिमामय और शांत हो।
🎯
आज अपने मन में किसी भी प्रकार की घबराहट या अनिश्चितता को दूर करने के लिए प्रतिदिन आत्म-संयम का अभ्यास करें; हर दिन को ऐसे जिएं जैसे वह सर्वश्रेष्ठ हो।
📌 प्रेरक संदेश:
जिसने हर दिन होशपूर्वक जीना सीख लिया, उसे मृत्यु का कभी कोई डर नहीं सताता। उदाहरण: एक अनुशासित छात्र जो पूरे साल नियम से पढ़ता है, वह परीक्षा के दिन बिल्कुल शांत और तनावमुक्त रहता है; इसी तरह जीवन की तैयारी करें।