दैनिक सद्विचार व पावन श्लोक (365 दिवस)

वर्ष के प्रत्येक दिन के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के पावन श्लोक, सरल हिंदी भावार्थ और जीवन में उतारने योग्य व्यावहारिक सीख।

कुल 365 श्लोक उपलब्ध • पृष्ठ 4 / 25
📅 दिवस 46 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.56 (साहस)
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2.56।।
भावार्थ: दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

[जीवन दृष्टि - साहस]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

टाल रहे किसी दायित्व को पूरा करें। (संदेश: अगला कदम धैर्य से उठाएँ — अपनी यात्रा की तुलना दूसरों से किए बिना।)

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📅 दिवस 47 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.57 (न्याय)
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.57।।
भावार्थ: सब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य उस-उस शुभ-अशुभको प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

[जीवन दृष्टि - न्याय]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

असहमति में उत्तर देने से पहले सामने वाले की बात सही तरह दोहराएँ। (संदेश: अगला कदम धैर्य से उठाएँ — संदेश आगे भेजने से पहले।)

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📅 दिवस 48 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.58 (कृतज्ञता)
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.58।।
भावार्थ: जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।

[जीवन दृष्टि - कृतज्ञता]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

एक व्यक्ति को बिना टोके पूरा सुनें। (संदेश: अगला कदम धैर्य से उठाएँ — साहस और करुणा दोनों के साथ।)

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📅 दिवस 49 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.59 (अनुशासन)
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।2.59।।
भावार्थ: निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

[जीवन दृष्टि - अनुशासन]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

बहाना बनाए बिना कहें, “मुझसे गलती हुई।” (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — खासकर तब, जब कोई देख न रहा हो।)

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📅 दिवस 50 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.60 (विनम्रता)
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।2.60।।
भावार्थ: हे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

[जीवन दृष्टि - विनम्रता]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

जिसके प्रयास से मदद मिली, उसे श्रेय दें। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — एक छोटे निर्णय से शुरुआत करें।)

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📅 दिवस 51 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.61 (लचीलापन)
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.61।।
भावार्थ: कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण होकर बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

[जीवन दृष्टि - लचीलापन]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

टाल रहे किसी दायित्व को पूरा करें। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — अपने कर्मों को बोलने दें।)

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📅 दिवस 52 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.62 (एकाग्रता)
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।
भावार्थ: ।।2.62 -- 2.63।। विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

[जीवन दृष्टि - एकाग्रता]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

असहमति में उत्तर देने से पहले सामने वाले की बात सही तरह दोहराएँ। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — क्योंकि भरोसा रोज़ बनता है।)

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📅 दिवस 53 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.63 (उदारता)
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।
भावार्थ: ।।2.62 -- 2.63।। विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

[जीवन दृष्टि - उदारता]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

एक व्यक्ति को बिना टोके पूरा सुनें। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — तुरंत परिणाम की जिद किए बिना।)

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📅 दिवस 54 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.64 (सत्य की खोज)
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।2.64।।
भावार्थ: ।।2.64 -- 2.65।। वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।

[जीवन दृष्टि - सत्य की खोज]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

बहाना बनाए बिना कहें, “मुझसे गलती हुई।” (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — और दूसरों की गरिमा बनाए रखते हुए।)

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📅 दिवस 55 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.65 (क्षमा)
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।2.65।।
भावार्थ: ।।2.64 -- 2.65।। वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।

[जीवन दृष्टि - क्षमा]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

जिसके प्रयास से मदद मिली, उसे श्रेय दें। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — फिर अनुभव से सीखें।)

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📅 दिवस 56 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.66 (जिम्मेदारी)
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।
भावार्थ: जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? 

[जीवन दृष्टि - जिम्मेदारी]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

टाल रहे किसी दायित्व को पूरा करें। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — भले ही आसान रास्ता आकर्षक लगे।)

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📅 दिवस 57 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.67 (समभाव)
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।2.67।।
भावार्थ: अपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है।

[जीवन दृष्टि - समभाव]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

असहमति में उत्तर देने से पहले सामने वाले की बात सही तरह दोहराएँ। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — और सुधार की गुंजाइश रखें।)

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📅 दिवस 58 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.68 (दयालुता)
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.68।।
भावार्थ: इसलिये हे महाबाहो ! जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत (वशमें की हुई) हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

[जीवन दृष्टि - दयालुता]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

एक व्यक्ति को बिना टोके पूरा सुनें। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — अपनी यात्रा की तुलना दूसरों से किए बिना।)

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📅 दिवस 59 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.69 (संयम)
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।
भावार्थ: सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मासे विमुखता) है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं), वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है।

[जीवन दृष्टि - संयम]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

बहाना बनाए बिना कहें, “मुझसे गलती हुई।” (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — संदेश आगे भेजने से पहले।)

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📅 दिवस 60 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 2.70 (आत्मचिंतन)
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।
भावार्थ: जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं।

[जीवन दृष्टि - आत्मचिंतन]: स्थिर मन बदलाव को स्पष्टता से देखता है और घबराहट के बजाय विवेक से कर्म चुनता है।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

जिसके प्रयास से मदद मिली, उसे श्रेय दें। (संदेश: दूसरों के योगदान को सम्मान दें — साहस और करुणा दोनों के साथ।)

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