दया व परोपकार
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दया व परोपकार

परोपकार और करुणा ही मानवता की सच्ची पहचान है। किसी दुखी के आँसू पोंछना और निस्वार्थ सहायता करना ईश्वर की सर्वोत्तम उपासना है।

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दो घड़े और टूटा घड़ा

दो घड़े और टूटा घड़ा

एक प्राचीन नगर में एक अत्यंत सरल और परिश्रमी जल-वाहक (भिश्ती) प्रतिदिन नदी से अपने मालिक के घर तक जल पहुँचाता था। वह अपने कंधे पर रखे काठ के मजबूत डांडे के दोनों सिरों पर दो मिट्टी के बड़े घड़े बाँधकर चलता था। उन दो घड़ों में से एक घड़ा बिल्कुल संपूर्ण, परिपूर्ण और पक्का था, जो नदी से घर तक पहुँचने पर जल की एक बूँद भी व्यर्थ नहीं होने देता था। परंतु दूसरा घड़ा पुराना था और उसके पेंदे के पास एक बारीक दरार थी। जब तक भिश्ती नदी से मालिक के घर पहुँचता, उस दरारदार घड़े का आधा पानी रास्ते में रिस-रिसकर टपक जाता था और वह केवल आधा भरा ही पहुँच पाता था। दो वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। संपूर्ण घड़े को अपनी पूर्णता पर बड़ा गर्व था, जबकि वह दरारदार घड़ा अपनी इस शारीरिक अक्षमता और कमी के कारण घोर हीनभावना और आत्मग्लानि से ग्रस्त था। एक दिन नदी के किनारे उस दरारदार घड़े ने दुखी होकर भिश्ती से क्षमा माँगी और कहा कि वह उसे तोड़कर फेंक दे क्योंकि वह आधा पानी गिराकर उसके परिश्रम को व्यर्थ कर देता है। भिश्ती ने मुस्कुराते हुए कहा—'क्या तुमने घर लौटते समय रास्ते के किनारे खिले सुंदर फूलों को नहीं देखा?' भिश्ती ने उसे दिखाया कि उसने रास्ते के केवल उसी ओर सुंदर फूलों के बीज बोए थे जिस ओर दरारदार घड़ा लटकता था। उस घड़े से टपकने वाले जल से सिंचकर वे बीज अद्भुत सुगंधित फूलों के बगीचे में बदल चुके थे, जिन्हें तोड़कर मालिक के मंदिर में पूजा के लिए चढ़ाया जाता था। यह कथा सिखाती है कि संसार में कोई भी प्राणी व्यर्थ या अपूर्ण नहीं है; हमारी कमजोरियाँ और त्रुटियाँ भी यदि सही दृष्टि से देखी जाएँ, तो वे सृष्टि को अद्वितीय सौंदर्य और सार्थकता प्रदान कर सकती हैं।

गुस्सा और कीलें

गुस्सा और कीलें

अजय नाम का एक अत्यंत कुशाग्र और प्रतिभाशाली बालक था, परंतु उसका स्वभाव अत्यंत क्रोधी और कटु था। जब भी उसे तनिक भी असुविधा होती या कोई उसकी बात न मानता, तो वह अपना आपा खो देता और अपने माता-पिता, मित्रों तथा सहपाठियों को अत्यंत अपमानजनक और हृदयविदारक अपशब्द कह डालता। उसके इस अनियंत्रित क्रोध से उसके सारे मित्र छूट गए और घर का वातावरण विषैला हो गया। उसके पिता ने उसे समझाने के लिए एक व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक उपाय सोचा। पिता ने अजय को लोहे की कीलों से भरी एक भारी थैली और एक हथौड़ा दिया। पिता ने नियम बनाया—'बेटा! जब भी तुम्हें तीव्र क्रोध आए, तुम बिना कुछ बोले बगीचे की उस पुरानी लकड़ी की बाड़ के पास जाओगे और अपनी पूरी शक्ति से उस बाड़ में एक कील ठोक दोगे।' पहले ही दिन अजय ने क्रोध में आकर बाड़ में सैंतीस कीलें ठोक डालीं। परंतु भारी हथौड़ा चलाना इतना थका देने वाला था कि धीरे-धीरे अजय ने अपने क्रोध पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया, क्योंकि उसे लगा कि गुस्सा रोकने की तुलना में बाड़ में कील ठोकना कहीं अधिक कठिन है। हफ़्तों के अभ्यास के बाद एक ऐसा दिन आया जब उसने दिन भर में एक भी कील नहीं ठोकी। पिता ने तब दूसरा निर्देश दिया कि जिस-जिस दिन वह अपने क्रोध पर पूर्ण संयम रखेगा, उस दिन वह बाड़ से एक-एक कील बाहर निकालेगा। महीनों के सतत प्रयास से अजय ने बाड़ की सारी कीलें बाहर निकाल लीं। पिता उसे बाड़ के पास ले गए और बोले—'बेटा! तुमने कीलें तो निकाल लीं, परंतु इन छेदों को देखो। यह बाड़ अब कभी पहले जैसी निर्दोष नहीं बन सकती। जब तुम क्रोध में किसी को कटु शब्द कहते हो, तो वे शब्द हृदय पर ठीक इसी प्रकार के गहरे और अमिट घाव छोड़ जाते हैं; चाहे तुम बाद में कितनी भी क्षमा माँग लो, वह घाव का निशान सदा बना रहता है।' अजय की आँखें खुल गईं और उसने सदा के लिए वाणी के संयम का व्रत ले लिया। यह कथा सिखाती है कि क्रोध के क्षणों में बोले गए कटु वचन संबंधों में ऐसे नासूर बना देते हैं जिन्हें समय का मरहम भी पूरी तरह नहीं भर पाता।

हाथी और रस्सी

हाथी और रस्सी

एक जिज्ञासु और विचारशील यात्री जब एक विशाल हाथी-प्रशिक्षण शिविर से गुजर रहा था, तो उसने एक अत्यंत विचित्र और आश्चर्यचकित करने वाला दृश्य देखा। वहाँ कई महाकाय, पर्वत जैसे बलिष्ठ हाथी खड़े थे, जो अपनी एक ही सूंड के झटके से विशाल वृक्षों को उखाड़ सकते थे और अपनी शक्ति से महलों की दीवारों को गिरा सकते थे। परंतु वे सभी हाथी किसी लोहे की भारी जंजीर या अभेद्य लोहे के पिंजरे में बंद नहीं थे; उनके केवल एक पिछले पैर में सन की एक साधारण, पतली सी रस्सी बंधी हुई थी, जिसे जमीन में गड़े एक छोटे से लकड़ी के खूंटे से बाँध दिया गया था। हाथी उस पतली रस्सी को तोड़ने या भागने का रत्ती भर भी प्रयास नहीं कर रहे थे। यात्री ने चकित होकर हाथी के महावत से इस रहस्य का कारण पूछा। महावत ने मुस्कुराते हुए एक गहरा मनोवैज्ञानिक रहस्य उजागर किया—'जब ये हाथी बहुत छोटे और नन्हे बच्चे होते हैं, तब हम इन्हें इसी आकार की रस्सी से बाँधते हैं। उस नन्हीं उम्र में उनके पास इतनी शारीरिक शक्ति नहीं होती कि वे इस रस्सी को तोड़ सकें। वे हफ्तों तक जोर लगाते हैं, खींचते हैं, छटपटाते हैं, परंतु रस्सी नहीं टूटती। अंततः उस नन्हें शावक के अवचेतन मन में यह अटूट विश्वास बैठ जाता है कि यह रस्सी उनसे अधिक शक्तिशाली है और वे इसे कभी नहीं तोड़ सकते। जब वे बड़े होकर महाकाय और अजेय गजराज बन जाते हैं, तब भी वे कभी इस रस्सी को तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते, क्योंकि उनका विश्वास आज भी उसी बचपन की सीमा में बँधा हुआ है।' यह कथा सिखाती है कि संसार में मनुष्य की सबसे बड़ी बेड़ियाँ लोहे की नहीं, बल्कि उसके अपने मस्तिष्क में बैठी 'काल्पनिक सीमाओं, असफलता के पुराने भयों और सीमित विश्वासों' की होती हैं; जिस दिन मनुष्य अपनी वास्तविक आत्म-शक्ति को पहचान लेता है, उस दिन हर मानसिक बंधन तिनके की तरह टूट जाता है।

समुद्र किनारे तारामछली

समुद्र किनारे तारामछली

रात्रि के एक भयानक चक्रवाती तूफान के पश्चात प्रातःकाल जब समुद्र शांत हुआ, तो सागर तट पर लाखों की संख्या में सजीव तारामछलियाँ (स्टारफिश) लहरों के तीव्र वेग से बहकर सूखी रेत पर आ गिरी थीं। जैसे-जैसे सूर्य आकाश में ऊपर चढ़ रहा था, धूप की प्रचंड तपन से रेत तपने लगी थी और वे असहाय समुद्री जीव जल के अभाव में तड़प-तड़पकर प्राण त्यागने की कगार पर थे। उसी समय तट पर टहल रहा एक वृद्ध, तार्किक और बुद्धिजीवी लेखक दूर से एक छोटे बालक को देखता है जो निरंतर झुककर रेत से कुछ उठाता और पूरी शक्ति से समुद्र की लहरों में उछाल देता। लेखक कौतूहलवश उस बालक के निकट पहुँचा और हँसते हुए बोला—'मूर्ख बालक! तुम यह क्या व्यर्थ का परिश्रम कर रहे हो? यह समुद्र तट मीलों लंबा है और यहाँ लाखों तारामछलियाँ धूप में सूख रही हैं। तुम भला कितनी मछलियों को बचा पाओगे? तुम्हारे इस नन्हे प्रयास से इस विशाल समस्या पर क्या फर्क पड़ने वाला है?' बालक ने उसकी निराशावादी बातों से विचलित हुए बिना, रेत से एक और छटपटाती हुई तारामछली को अपने कोमल हाथों में उठाया। उसने उसे अत्यंत वात्सल्य से देखा और पूरी शक्ति से उफनती लहरों के गहरे जल में फेंक दिया। जैसे ही वह मछली जल में तैरने लगी, बालक ने मुस्कुराकर उस वृद्ध की आँखों में देखते हुए कहा—'महोदय! इस विशाल संसार के लिए भले ही कोई फर्क न पड़े, परंतु इस एक तारामछली के लिए तो जीवन और मृत्यु का पूरा फर्क पड़ गया!' बालक के इस उत्तर ने वृद्ध लेखक के अहंकार और शुष्क बौद्धिकता को एक ही झटके में भस्म कर दिया। वृद्ध ने भी झुककर रेत से मछलियाँ उठाकर समुद्र में फेंकना आरंभ कर दिया। यह कथा सिखाती है कि संसार के सारे दुखों को एक साथ समाप्त न कर पाने की लाचारी में हाथ पर हाथ धरकर बैठने के बजाय, किसी एक असहाय की सहायता करके उसके पूरे संसार को बदल देना ही सबसे बड़ा परोपकार और मानवता है।

रास्ते का पत्थर

रास्ते का पत्थर

प्राचीन काल के एक बुद्धिमान और प्रजावत्सल राजा ने अपने राज्य के नागरिकों की नागरिक चेतना, उत्तरदायित्व और पुरुषार्थ की परीक्षा लेने के लिए एक अनूठी योजना बनाई। राजा ने रात के अंधकार में राज्य के सबसे मुख्य और व्यस्त राजमार्ग के ठीक मध्य में एक भारी, विशाल शिलाखंड रखवा दिया। फिर राजा पास की झाड़ियों के पीछे छिपकर देखने लगे कि कौन उस पत्थर को हटाता है। सुबह से लेकर शाम तक राज्य के धनी व्यापारी, सामंत, दरबारी और साधारण राहगीर वहाँ से निकले। अधिकांश लोगों ने उस पत्थर के कारण ठोकर खाई और राजा व प्रशासन को सड़कों की दुर्दशा के लिए कोसते हुए किनारे से निकल गए; किसी ने भी उस बाधा को हटाने का प्रयास नहीं किया। संध्या समय सिर पर हरी सब्जियों की भारी टोकरी उठाए एक निर्धन किसान वहाँ पहुँचा। थकान और भारी बोझ के उपरांत भी उसने सोचा कि रात के अंधेरे में किसी अन्य पथिक को इससे प्राणघातक चोट लग सकती है। उसने अपनी टोकरी जमीन पर रखी और अपनी पूरी शारीरिक शक्ति लगाकर उस भारी पत्थर को धकेलना आरंभ किया। पसीने से लथपथ होकर जब उसने उस शिलाखंड को सड़क के किनारे खाई में धकेल दिया, तो उसने देखा कि जिस गड्ढे में पत्थर रखा था, वहाँ सोने के सिक्कों से भरी एक रेशमी थैली और राजा का एक पत्र रखा था। पत्र में लिखा था—'यह स्वर्ण उस नागरिक के लिए राजा का उपहार है जो समस्याओं की शिकायत करने के बजाय उन्हें दूर करने का पुरुषार्थ करता है।' यह कथा सिखाती है कि मार्ग की प्रत्येक बाधा वास्तव में नागरिक उत्तरदायित्व और नए अवसरों का द्वार होती है।

मन के दो भेड़िये

मन के दो भेड़िये

एक प्राचीन और शांत पर्वतीय उपत्यका में एक वयोवृद्ध, बुद्धिमान दादाजी अपने चंचल और संवेदनशील पोते कबीर के साथ कैम्पफायर की जलती हुई आग के पास बैठे थे। कबीर उस दिन अपने एक मित्र द्वारा किए गए विश्वासघात और कटु व्यवहार के कारण भयंकर क्रोध, प्रतिशोध और ईर्ष्या की ज्वाला में जल रहा था। बालक का यह मानसिक संताप देखकर दादाजी ने उसे मानव चेतना के सबसे गूढ़ और सार्वभौमिक सत्य को समझाने के लिए एक अमर कथा सुनाई। दादाजी ने कहा—'मेरे प्यारे बच्चे! हम सभी मनुष्यों के भीतर हर पल एक अत्यंत भीषण और भयानक संग्राम चलता रहता है। यह संग्राम हमारे अंतःकरण में रहने वाले दो विशाल और शक्तिशाली भेड़ियों के बीच का युद्ध है। पहला भेड़िया अत्यंत अंधकारमय, क्रूर और हिंसक है; वह क्रोध, ईर्ष्या, लालच, घमंड, आत्म-दया, प्रतिशोध, झूठ और अहंकार का प्रतीक है। परंतु दूसरा भेड़िया अत्यंत उज्ज्वल, शांत और दिव्य है; वह प्रेम, शांति, करुणा, क्षमा, विनम्रता, सत्य, परोपकार, उदारता और आशा का साक्षात स्वरूप है। ये दोनों भेड़िये प्रत्येक मनुष्य के हृदय में एक-दूसरे के रक्त के प्यासे होकर दिन-रात लड़ते रहते हैं।' कबीर ने कुछ पल अत्यंत गहराई से विचार किया। उसने कौतूहल और घबराहट से दादाजी की आँखों में देखते हुए पूछा—'दादाजी! अंत में इस भयानक युद्ध में कौन सा भेड़िया जीतता है?' दादाजी के चेहरे पर एक शांत, करुणामयी मुस्कान खिल गई। उन्होंने बालक के कंधे पर हाथ रखकर उत्तर दिया—'वत्स! वही भेड़िया जीतता है, जिसे तुम प्रतिदिन अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों से भोजन कराते हो!' बालक का अंतर्मन इस सत्य से आलोकित हो उठा। यह कथा सिखाती है कि हमारे भीतर अच्छाई और बुराई दोनों की शक्ति विद्यमान है; हम अपने विचारों और आदतों से जिस वृत्ति का पोषण करते हैं, हमारा चरित्र और भविष्य अंततः वैसा ही बन जाता है।

पहाड़ों की गूँज

पहाड़ों की गूँज

एक नन्हा बालक आरव अपने पिता के साथ एक सुरम्य और विशाल पर्वतीय घाटी की सैर पर निकला था। पगडंडी पर चलते समय अचानक आरव का पैर एक नुकीले पत्थर से टकराया और उसे गहरी चोट लग गई। असह्य पीड़ा के आवेग में बालक के मुँह से अनायास ही एक तीव्र चीख निकल गई—'आह! मुझे तुमसे नफरत है!' तभी सामने की विशाल, हिम-आच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं से वही शब्द गगनभेदी स्वर में टकराकर गूँज उठे—'मुझे तुमसे नफरत है... नफरत है... नफरत है!' बालक स्तब्ध रह गया; उसने सोचा कि घाटियों में कोई अदृश्य शत्रु छिपा है जो उसका उपहास उड़ा रहा है। भय और क्रोध में उसने पर्वत की ओर मुँह करके जोर से चिल्लाया—'कायर! सामने आओ! तुम कौन हो?' पहाड़ों ने तुरंत वही भयानक प्रतिध्वनि दोहराई—'कायर! सामने आओ! तुम कौन हो?' बालक भयभीत होकर अपने पिता की गोद में छिप गया और रोते हुए बोला कि कोई दुष्ट उसे डरा रहा है। पिता ने मुस्कुराते हुए बालक के सिर पर हाथ फेरा और कहा—'बेटा! ध्यान से सुनो।' पिता ने पर्वत की ओर मुँह करके पूरे प्रेम और मधुर स्वर में पुकारा—'तुम बहुत सुंदर हो! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ!' क्षण भर में पहाड़ों से वही मधुर स्वर अमृत बनकर लौटा—'तुम बहुत सुंदर हो... प्यार करता हूँ... प्यार करता हूँ!' बालक की आँखें विस्मय से खुल गईं। पिता ने उसे जीवन का सबसे महान दार्शनिक पाठ सिखाया—'बेटा! लोग इसे भौतिक विज्ञान में 'प्रतिध्वनि' (Echo) कहते हैं, परंतु वास्तव में यही 'जीवन का सनातन नियम' है। संसार तुम्हें वही लौटाता है जो तुम संसार को देते हो। यदि तुम घृणा, क्रोध और कटुता दोगे, तो चारों ओर से वही लौटकर तुम्हें नष्ट करेगी; परंतु यदि तुम प्रेम, सम्मान, दया और शुभकामनाएँ दोगे, तो संपूर्ण ब्रह्मांड तुम्हारे जीवन को आनंद से भर देगा।' यह कथा सिखाती है कि हमारा वर्तमान और भविष्य हमारे अपने कर्मों और वाणी का ही दर्पण है।

पेंसिल बनाने वाले की सीख

पेंसिल बनाने वाले की सीख

एक प्राचीन और शांत नगर में काठ और ग्रेफाइट से सुंदर पेंसिलें बनाने वाला एक कुशल वृद्ध कारीगर रहता था। एक दिन जब उसने देवदार की सुगंधित लकड़ी से एक अत्यंत सुंदर, चिकनी और चमकीली पेंसिल तैयार की, तो उसे डिब्बे में बंद करके संसार में भेजने से पूर्व उसने उस नन्हीं पेंसिल को अपने पास बिठाया और जीवन के पाँच सबसे महत्वपूर्ण उपदेश दिए। कारीगर ने कहा—'हे नन्हीं पेंसिल! यदि तुम संसार में एक महान और सार्थक अस्तित्व बनना चाहती हो, तो मेरी इन पाँच बातों को अपने अंतःकरण में सदा याद रखना। पहला: तुम संसार में अद्भुत चित्र और अमर ग्रंथ रच सकती हो, परंतु केवल तभी जब तुम स्वयं को किसी योग्य कलाकार या लेखक के हाथों में समर्पित करोगी। दूसरा: समय-समय पर तुम्हें एक तीखे कटर से छिला जाएगा; वह छिलाई अत्यंत दर्दनाक होगी, परंतु याद रखना कि एक सुंदर और बारीक लिखाई लिखने के लिए उस तीखी छिलाई से गुजरना अनिवार्य है। तीसरा: तुम लिखते समय जो भी त्रुटियाँ या गलतियाँ करोगी, उन्हें मिटाने के लिए तुम्हारे सिर पर रबर (इरेज़र) का वरदान दिया गया है; गलतियों को सुधारने से कभी मत डरना। चौथा: तुम्हारा बाह्य रूप, रंग और लकड़ी चाहे कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, तुम्हारी वास्तविक सार्थकता और आत्मा तुम्हारे भीतर छिपे उस 'काले ग्रेफाइट (सीसे)' में है, अतः अपने आंतरिक गुणों को सदा सुरक्षित रखना। और पाँचवाँ: तुम जिस किसी भी कागज या धरातल पर चलोगी, वहाँ अपनी अमिट और सुंदर छाप छोड़ना; चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, लिखना कभी बंद मत करना।' यह कथा सिखाती है कि मनुष्य का जीवन भी एक पेंसिल की भाँति है; जब हम उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होते हैं, कठिनाइयों के तराशे जाने को स्वीकार करते हैं, भूलों को सुधारते हैं और अपने आंतरिक नैतिक चरित्र को प्रधानता देते हैं, तभी हमारा जीवन संसार में एक अमर कृति बनता है।

आधा भरा गिलास

आधा भरा गिलास

तक्षशिला के एक अत्यंत प्रतिष्ठित गुरुकुल में आचार्य विश्वनाथ अपने शिष्यों को जीवन का सर्वोच्च दार्शनिक पाठ पढ़ाने के लिए एक दिन कक्षा में प्रविष्ट हुए। आचार्य के हाथ में एक पारदर्शी काँच का गिलास था, जिसके भीतर ठीक आधे स्तर तक स्वच्छ जल भरा हुआ था। आचार्य ने उस गिलास को मेज के मध्य में रखा और सभी शिष्यों से पूछा कि उन्हें सामने क्या दिखाई दे रहा है। अधिकांश शिष्यों ने तुरंत उत्तर दिया कि मेज पर आधा खाली गिलास रखा हुआ है। केवल एक शांत शिष्य ने कहा कि गिलास आधा जल से भरा हुआ है। आचार्य ने गिलास को हाथ में उठाया और उसे ऊपर हवा में उठाकर शिष्यों से एक अनोखा प्रश्न पूछा—'इस गिलास का वजन कितना होगा?' शिष्यों ने पचास ग्राम से लेकर दो सौ ग्राम तक के अनुमान लगाए। आचार्य ने मुस्कुराते हुए समझाया—'इस गिलास का वास्तविक वजन कोई महत्व नहीं रखता; असली महत्व इस बात का है कि मैं इसे कितनी देर तक अपने हाथ में थामे रहता हूँ। यदि मैं इसे एक मिनट पकड़ूँ, तो यह अत्यंत हल्का लगेगा। यदि मैं इसे एक घंटे तक बिना हिलाए पकड़े रहूँ, तो मेरी भुजा में असह्य दर्द होने लगेगा। और यदि मैं इसे पूरे दिन इसी प्रकार पकड़े रहूँ, तो मेरा हाथ सुन्न हो जाएगा और मैं लकवाग्रस्त होकर गिर पड़ूँगा। हर स्थिति में पानी का वजन वही है, परंतु जितनी देर मैं इसे थामे रखूँगा, यह उतना ही भारी होता जाएगा।' आचार्य ने जीवन का गूढ़ सत्य प्रकट करते हुए कहा कि हमारी चिंताएँ, शिकायतें, तनाव और निराशावादी दृष्टिकोण भी इस गिलास की भाँति होते हैं। यदि हम जीवन में 'आधा खाली' देखने की आदत डालेंगे और चिंताओं को रात-दिन पकड़े रहेंगे, तो हमारा जीवन पंगु हो जाएगा। परंतु यदि हम 'आधा भरा' देखकर ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहेंगे और चिंताओं के गिलास को समय पर नीचे रखना सीखेंगे, तो हमारा मन सदा आनंद और ऊर्जा से भरा रहेगा। यह कथा सिखाती है कि सुख और दुख परिस्थितियों में नहीं, बल्कि हमारे अपने दृष्टिकोण और चिंताओं को त्यागने की क्षमता में निहित होते हैं।

राजा शिबि और शरणागत कबूतर

राजा शिबि और शरणागत कबूतर

उशीनर देश के परम प्रतापी, दयालु और शरणागत-वत्सल राजा शिबि अपने दान और न्याय के लिए तीनों लोकों में विख्यात थे। राजा के धर्म और करुणा की परीक्षा लेने के लिए देवराज इंद्र ने एक भूखे बाज (श्येन) का रूप धारण किया और अग्निदेव ने एक भयभीत, श्वेत कपोत (कबूतर) का रूप लिया। बाज से जान बचाकर वह नन्हा कबूतर थर-थर कांपता हुआ सीधे राजा शिबि की गोद में आ गिरा और प्राण-रक्षा की गुहार लगाई। राजा ने उसे अभयदान दिया। तभी शिकारी बाज राजा के सम्मुख आया और तर्क दिया कि कबूतर उसका प्राकृतिक आहार है; यदि राजा ने उसका आहार छीन लिया तो वह भूख से मर जाएगा, जिससे राजा को बाज की हत्या का पाप लगेगा। धर्मसंकट में पड़े राजा शिबि ने कबूतर के जीवन की रक्षा और बाज की भूख मिटाने के लिए एक अद्भुत उपाय निकाला—उन्होंने कबूतर के वजन के बराबर अपने ही शरीर का माँस काटकर बाज को देने का प्रस्ताव रखा। एक तराजू मँगवाया गया; एक पलड़े पर नन्हे कबूतर को रखा गया और दूसरे पलड़े पर राजा ने अपनी जांघों और भुजाओं का माँस काटकर रखना शुरू किया। परंतु एक अलौकिक चमत्कार हुआ—राजा जितना माँस काटते, वह नन्हा कबूतर उतना ही भारी होता जाता। अंततः जब शरीर का अधिकांश माँस कटने पर भी पलड़ा बराबर न हुआ, तो राजा शिबि स्वयं उठकर अपने पूरे लहूलुहान शरीर के साथ तराजू के उस पलड़े पर बैठ गए। राजा के इस सर्वोच्च आत्म-बलिदान और शरणागत-रक्षा के संकल्प को देखकर देवराज इंद्र और अग्निदेव अपने साक्षात दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। उन्होंने राजा के शरीर को दिव्य कांति से पुनः स्वस्थ कर दिया और उन्हें अमर यश का वरदान दिया। यह कथा सिखाती है कि जो व्यक्ति अपने शरणागत और निर्बल की रक्षा के लिए अपने प्राणों का भी उत्सर्ग करने को तत्पर रहता है, उसका स्थान संसार के समस्त सम्राटों से ऊपर होता है।

पत्थर का सूप और साझा सहयोग

पत्थर का सूप और साझा सहयोग

युद्ध और अकाल के पश्चात एक थका-हारा, भूखा संन्यासी यात्री जब एक पहाड़ी गाँव में पहुँचा, तो उसने देखा कि अविश्वास, भय और स्वार्थ के कारण गाँव के सभी निवासियों ने अपने-अपने घरों के कपाट बंद कर लिए थे और अपने भोजन को जमीन के भीतर छिपा रखा था। किसी ने भी उस भूखे यात्री को मुट्ठी भर अन्न देने से इनकार कर दिया। यात्री ने न तो भिक्षा माँगी और न ही क्रोध किया। उसने मुस्कुराते हुए गाँव के चौराहे पर एक बड़ा मिट्टी का बर्तन स्थापित किया, कुएँ से पानी भरा और नीचे सूखी लकड़ियों की आग जला दी। फिर उसने अपनी झोली से एक अत्यंत चिकना, गोल और सुंदर पत्थर निकाला और उसे बड़े आदर से उस उबलते हुए पानी में डाल दिया। कौतूहलवश जब ग्रामीण खिड़कियों से झाँकने लगे, तो यात्री ने घोषणा की कि वह संसार का सबसे स्वादिष्ट 'पत्थर का सूप' (Stone Soup) बना रहा है। उसने सूप को चखा और कहा कि यह अत्यंत स्वादिष्ट है, परंतु यदि इसमें थोड़ी सी पत्तागोभी और गाजर मिल जाती, तो यह राजाओं के भोज जैसा बन जाता। एक ग्रामीण उत्सुकता में अपने घर से कुछ गाजर और गोभी ले आया और हांडी में डाल दी। फिर यात्री ने कहा कि थोड़े से आलू और नमक से इसका स्वाद स्वर्ग जैसा हो जाएगा; दूसरा ग्रामीण आलू ले आया। धीरे-धीरे प्याज, दालें, मसाले, मक्खन और जड़ी-बूटियाँ ग्रामीण अपने-अपने घरों से लाते गए और उस हांडी में डालते गए। कुछ ही घंटों में चौराहे पर एक अत्यंत पौष्टिक, सुगंधित और स्वादिष्ट महा-सूप तैयार हो गया। पूरे गाँव ने मिलकर दावत उड़ाई और आनंद से नृत्य किया। ग्रामीणों ने माना कि पत्थर वास्तव में जादुई था, परंतु सच्चा जादू यह था कि साझा सहयोग और उदारता ने अभाव को भी समृद्धि में बदल दिया था। यह कथा सिखाती है कि जब लोग स्वार्थ का त्याग करके थोड़ा-थोड़ा योगदान देते हैं, तो कठिन से कठिन संकट भी उत्सव में परिवर्तित हो जाता है।

भोजन के समय खाली कुर्सी

भोजन के समय खाली कुर्सी

आर्य पब्लिक स्कूल की आठवीं कक्षा में रिया अपनी चार सहेलियों के एक अत्यंत लोकप्रिय, मुखर और संपन्न समूह (ग्रुप) की नेता थी। उनके समूह की यह अघोषित परंपरा थी कि दोपहर के भोजन के समय कैफेटेरिया की सबसे अच्छी गोलाकार मेज पर केवल वे ही बैठती थीं और किसी अन्य सहपाठी को अपने घेरे में प्रविष्ट नहीं होने देती थीं। सत्र के मध्य में देव नाम का एक अत्यंत संकोची, अंतर्मुखी और साधारण पृष्ठभूमि का नया छात्र कक्षा में प्रविष्ट हुआ। उसके वस्त्र पुराने थे, वह हकलाता था और अपनी आर्थिक तंगहाली के कारण किसी से आँखें मिलाने का साहस नहीं जुटा पाता था। दोपहर के अवकाश में जब सभी बच्चे अपने-अपने समूहों में बैठकर हँसते-खिलखिलाते भोजन कर रहे होते, तो देव कैफेटेरिया के सबसे दूरस्थ और गंदे कोने में, दीवार की ओर मुँह करके अकेला बैठा रहता था और अपनी सूखी रोटी चुपचाप खाता था। विद्यालय के अन्य उद्दंड छात्र अक्सर उसकी खाली थाली और हकलाहट का उपहास उड़ाते थे। एक दिन रिया ने खिड़की से देखा कि देव अपनी खाली पानी की बोतल लिए नल के पास खड़ा रो रहा था क्योंकि कुछ छात्रों ने उसका तिरस्कार किया था। उस दृश्य ने रिया के संवेदनशील अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। उसने विचार किया कि हमारे पास भोजन और मित्रों की प्रचुरता है, फिर भी हम दूसरों को अकेला छोड़ देते हैं। अगले दिन लंच बेल बजते ही जब रिया का समूह अपनी विशेष मेज पर बैठा, तो रिया ने अपनी सहेलियों के भारी विरोध और संकोच के उपरांत भी अपनी मेज की सबसे प्रमुख कुर्सी खाली रखी। रिया उठी, पूरे कैफेटेरिया के सम्मुख शांत कदमों से चलकर उस कोने में बैठी देव के पास पहुँची। उसने मुस्कुराते हुए कहा—'नमस्ते देव! आज हमारी मेज पर एक कुर्सी खाली है, क्या तुम हमारे साथ भोजन करने चलोगे?' पूरा कैफेटेरिया सन्नाटे में डूब गया। देव की आँखों में अविश्वास और कृतज्ञता के आँसू छलक आए। रिया ने उसे अपनी मेज पर लाकर बिठाया, अपना भोजन उसके साथ साझा किया और अपनी सहेलियों को भी देव के साथ आत्मीयता से जोड़ा। रिया के इस एक संवेदनशील कदम ने कक्षा से गुटबाजी और एकाकीपन के विषैले माहौल को सदा के लिए समाप्त कर दिया। यह कथा सिखाती है कि किसी उपेक्षित, अकेले और असहाय व्यक्ति की ओर मित्रता और सम्मान का हाथ बढ़ाना ही सच्ची करुणा और श्रेष्ठ संस्कार है।

ग्रुप चैट से अलग मित्र और संवेदना

ग्रुप चैट से अलग मित्र और संवेदना

कक्षा नौवीं के पाँच सहपाठियों—रोहन, कबीर, साहिल, वरुण और समीर—का बचपन से एक अटूट मित्रता समूह था। वे हर काम साथ करते थे और उनका एक मुख्य व्हाट्सएप ग्रुप था 'द फाइव स्टार्स'। परंतु जैसे-जैसे वे बड़े हुए, समीर का परिवार आर्थिक तंगी से घिर गया। समीर महंगे कपड़े नहीं पहन पाता था, बड़े कैफे में पिज्जा पार्टी के पैसे नहीं दे सकता था और सोशल मीडिया पर महंगे शौक का दिखावा नहीं करता था। बाकी चार मित्रों ने समीर की संकोची सादगी को अपनी 'कूल लाइफस्टाइल' में एक बाधा समझा। उन्होंने चुपके से समीर को बताए बिना एक नया गुप्त व्हाट्सएप ग्रुप बना लिया जिसका नाम रखा—'द कोर फोर' (The Core Four)। उस गुप्त समूह में वे सप्ताहांत की सिनेमा यात्राओं, छुट्टियों की योजनाओं और निजी गपशप की योजनाएं बनाते, जबकि मुख्य ग्रुप में वे मौन रहते। सोमवार की सुबह जब वे चारों स्कूल में मिलते, तो वे आपस में उन गुप्त यात्राओं के कोडवर्ड्स में बात करते और हंसते, जबकि समीर उनके पास बैठा हुआ अकेला, उपेक्षित और स्तब्ध महसूस करता। समीर को समझ नहीं आता था कि उसके सबसे घनिष्ठ मित्र उससे क्या छिपा रहे हैं। एक दिन वरुण ने गलती से उस गुप्त ग्रुप का एक स्क्रीनशॉट मुख्य ग्रुप में भेज दिया जिसमें समीर का यह कहकर मजाक उड़ाया गया था कि 'समीर को मत बताना, उसके पास तो पैसे ही नहीं हैं!' समीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। अपने बचपन के भाइयों द्वारा इस गुप्त डिजिटल बहिष्कार और अपमान ने समीर के हृदय को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। वह रोते हुए स्कूल से भाग गया और उसने कई दिनों तक स्कूल आना छोड़ दिया। उस रात रोहन की अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा। रोहन ने सोचा—'हम खुद को दोस्त कहते हैं, परंतु हमने एक भाई की गरीबी का मजाक उड़ाकर उसे अपने जीवन से बाहर फेंक दिया!' रोहन ने अन्य तीनों को डांटा और वह गुप्त ग्रुप तुरंत डिलीट करवाया। चारों मित्र समीर के घर पहुँचे, समीर के माता-पिता और समीर के पैरों में गिरकर अपनी संवेदनहीनता के लिए रोते हुए क्षमा माँगी। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मित्रता दिलों से होती है, जेब के पैसों या डिजिटल ग्रुप्स से नहीं। यह कथा सिखाती है कि किसी को डिजिटल समूह या बातचीत से बाहर रखना एक अदृश्य खंजर की तरह होता है जो आत्मा को घायल कर देता है; सच्ची मित्रता सबको साथ लेकर चलने में है, किसी को अकेला छोड़ने में नहीं।

द्वार पर आया असहाय पिल्ला

द्वार पर आया असहाय पिल्ला

दिसंबर की एक हाड़ कंपा देने वाली सर्द रात को शिमला में मूसलाधार तूफानी बारिश और बर्फबारी हो रही थी। कक्षा दसवीं के छात्र करण के आलीशान बंगले के मुख्य लोहे के फाटक के नीचे एक छोटा सा, बेसहारा और भूखा लावारिस पिल्ला ठंड से थर-थर कांपता हुआ शरण लेने आया। पिल्ले का एक पैर किसी गाड़ी की टक्कर से बुरी तरह जख्मी था और उससे खून बह रहा था। करण का बड़ा भाई रोहन, जो अपनी महंगी गाड़ियों की सफाई और विदेशी नस्ल के कुत्तों का शौकीन था, ने उस भारतीय देशी पिल्ले को देखते ही लाठी से पीटा और उसे कीचड़ तथा बर्फीले पानी में बाहर फेंक दिया। करण अपने गर्म रजाई वाले कमरे में बैठा उस मूक प्राणी की दर्दनाक चीखें सुन रहा था। उसका अंतर्मन तड़प उठा। उसने सोचा—'यदि मैं इस कड़कड़ाती ठंड में इस बेजुबान को ऐसे ही छोड़ दूँगा, तो यह सुबह का सूरज नहीं देख पाएगा।' करण ने अपने भाई के क्रोध और परिवार की डांट की परवाह किए बिना रात के बारह बजे रेनकोट पहना और टॉर्च लेकर अंधेरे में बाहर निकला। उसने कीचड़ में बेहोश पड़े उस पिल्ले को अपनी बाहों में उठाया, अपने पुराने गर्म स्वेटर में लपेटा और चुपके से गैराज के हीटर के पास ले आया। करण ने रात भर जागकर उसके घाव को साफ किया, उस पर दवाई लगाई और उसे गरम दूध पिलाया। अगली सुबह जब रोहन ने उसे बाहर फेंकने की जिद की, तो उनके वयोवृद्ध दादाजी ने महाभारत के अंतिम पर्व का वह अमर प्रसंग सुनाया जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर ने एक लावारिस कुत्ते के लिए स्वर्ग के रथ को ठुकरा दिया था—'मनुष्य के चरित्र की वास्तविक कसौटी यह है कि वह उन मूक प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करता है जो उसे बदले में कुछ नहीं दे सकते।' दादाजी के आदेश से उस पिल्ले को घर में रख लिया गया और उसका नाम 'शेरू' रखा गया। चार महीने बाद जब घर में आधी रात को शॉर्ट-सर्किट से भयंकर आग लग गई और जहरीला धुआँ पूरे घर में फैल गया, तो शेरू ने लगातार भौंककर और रोहन की चादर खींचकर पूरे परिवार को जगाया जिससे सभी की जान बच सकी! यह कथा सिखाती है कि मूक और असहाय प्राणियों पर दया करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है; आपके द्वारा की गई निस्वार्थ दया संकट के समय आपका सबसे बड़ा जीवन-रक्षक कवच बनकर लौटती है।

बस की सीट और बुजुर्ग यात्री

बस की सीट और बुजुर्ग यात्री

मई की चिलचिलाती दोपहर में एक खचाखच भरी, घुटन भरी और पुरानी अंतर-शहरीय सरकारी बस ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों पर धक्के खाती हुई आगे बढ़ रही थी। कॉलेज का अठारह वर्षीय एथलीट छात्र सिद्धार्थ, जो सुबह से फुटबॉल का एक थका देने वाला टूर्नामेंट खेलकर लौट रहा था, खिड़की वाली आरामदायक सीट पर कान में ईयरफोन लगाए गाने सुन रहा था। उसके पैर दर्द से टूट रहे थे और वह अपनी आँखें बंद करके आराम करने का आनंद ले रहा था। रास्ते के एक छोटे से ग्रामीण बस स्टॉप पर एक अस्सी वर्षीय वयोवृद्ध किसान, बाबा सुखराम, बस में चढ़े। उनके सिर पर ताजी सब्जियों की भारी गठरी थी, उनके हाथ-पैर कमजोरी और वृद्धावस्था से कांप रहे थे और वे सांस के लिए हाँफ रहे थे। बस में खड़े होने की भी जगह न थी; बस जब भी मोड़ पर तेजी से मुड़ती या ब्रेक लगाती, तो बाबा सुखराम का कांपता हुआ शरीर लोहे की खूंटी से टकराता और वे गिरते-गिरते बचते। बस में कई नौजवान लड़के बैठे थे, परंतु सभी ने जानबूझकर अपने सिर झुका लिए, कोई मोबाइल में गेम खेलने का ढोंग करने लगा तो कोई सोने का नाटक करने लगा। सिद्धार्थ के मन में भी एक स्वार्थी विचार आया—'मैंने इस सीट का पूरा टिकट खरीदा है, मेरे पैर भी दर्द कर रहे हैं, मैं क्यों दो घंटे धूप में खड़ा रहूँ?' परंतु जब सिद्धार्थ ने उस वृद्ध के कांपते हुए पैरों और उसकी आँखों में छलकती बेबसी को देखा, तो उसे अपने वयोवृद्ध दादाजी का चेहरा याद आ गया। सिद्धार्थ की अंतरात्मा ने उसके स्वार्थ को झकझोर दिया। सिद्धार्थ ने एक पल भी नहीं सोचा; उसने अपने ईयरफोन हटाए, मुस्कुराते हुए अपनी आरामदायक सीट छोड़ी और अत्यंत आदर से उस वृद्ध किसान का हाथ थामकर उन्हें अपनी सीट पर बैठा दिया—'बाबा! आप यहाँ बैठिए। मेरी जवानी इसलिए है कि मैं आपके लिए खड़ा रह सकूँ।' बाबा की आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले और उन्होंने कांपते हाथों से सिद्धार्थ के सिर पर आशीर्वाद का ऐसा हाथ रखा कि सिद्धार्थ की सारी थकान पलक झपकते ही गायब हो गई। सिद्धार्थ के इस उच्च आचरण को देखकर बस के अन्य यात्रियों की भी आँखें खुल गईं और उन्होंने अन्य जरूरतमंदों को सीटें दीं। यह कथा सिखाती है कि बुजुर्गों, दुर्बलों और असहायों के प्रति संवेदनशीलता ही मनुष्यता का वास्तविक आभूषण है; अपनी सुविधा का त्याग करके दूसरों को सहारा देना ही आत्मा को सर्वोच्च शांति और ईश्वर का आशीर्वाद प्रदान करता है।