📅 दिवस 286 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.5 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।
भावार्थ: और वे प्राणी भी वास्तव में मुझमें स्थित नहीं हैं—मेरे इस अलौकिक ईश्वरीय योग को देख! सब प्राणियों का पोषण करने वाला और प्राणियों को उत्पन्न करने वाला मेरा आत्मा वास्तव में प्राणियों में स्थित नहीं है।
एक सच्चा माता-पिता, नेता या शिक्षक वही है जो दूसरों का लालन-पालन और मार्गदर्शन तो पूरी शक्ति से करे, लेकिन उनके ऊपर अपना अधिकार या मालिकाना हक न जताए। प्रेम करना लेकिन स्वतंत्र छोड़ देना—यही ईश्वरीय स्वभाव का सबसे बड़ा रहस्य है।
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आज अपने बच्चों, अधीनस्थों या मित्रों की मदद करते समय उन पर अहसान जताने या उन पर हुक्म चलाने की आदत छोड़ें; निस्वार्थ भाव से उनका पोषण करें।
📌 प्रेरक संदेश:
सच्चा प्रेम स्वतंत्रता देता है, बंधन नहीं बनाता। उदाहरण: एक माली पेड़ को खाद और पानी देकर बड़ा करता है, लेकिन जब पेड़ फल देता है तो वह फल राहगीरों के लिए छोड़ देता है; इसी तरह निष्काम पोषण करें।
📅 दिवस 287 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.6 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।9.6।।
भावार्थ: जैसे सब जगह विचरने वाली महान वायु सदैव आकाश में ही स्थित रहती है (परंतु आकाश को कभी स्पर्श या मैला नहीं कर पाती), वैसे ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं—ऐसा तू समझ।
आंधी चले, तूफान आए या सुगंध-दुर्गंध उड़े—आकाश हमेशा अछूता और बेदाग रहता है। इसी तरह हमारे मन को भी आकाश जैसा विशाल होना चाहिए। दुनिया में लोग आपकी तारीफ करें या गाली दें, अपने मन को इतना विशाल बनाइए कि कोई भी बाहरी हलचल आपकी पवित्रता को गंदा न कर सके।
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आज जब कोई आपके सामने कटु वचन बोले या गुस्सा करे, तो आकाश की तरह शांत रहें; हवा की तरह उन शब्दों को गुजर जाने दें, उन्हें अपने भीतर पकड़कर न रखें।
📌 प्रेरक संदेश:
आपका मन कोई कूड़ेदान नहीं है कि कोई भी उसमें अपनी कड़वाहट फेंक जाए; आकाश जैसे विशाल बनें। उदाहरण: जब तेज आंधी चलती है तो धूल उड़ती है, पर आंधी थमते ही आकाश वैसा का वैसा नीला और शांत दिखाई देता है।
📅 दिवस 288 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.7 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।9.7।।
भावार्थ: हे कुंतीपुत्र अर्जुन! कल्प के अंत में (प्रलयकाल में) सब प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं (अर्थात प्रकृति में लीन हो जाते हैं), और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें पुनः उत्पन्न करता हूँ।
इस संसार में न तो कुछ हमेशा के लिए खोता है और न ही समाप्त होता है। जो ऊर्जा आज विलीन हुई है, वह कल नए रूप में प्रस्फुटित होगी। जब हम यह समझ लेते हैं कि जीवन एक निरंतर बहती नदी है, तो हम किसी असफलता या नुकसान पर हमेशा के लिए निराश होना छोड़ देते हैं।
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आज यदि किसी काम में विफलता या निराशा हाथ लगी हो, तो यह समझें कि यह केवल एक दौर का अंत है; कल एक नया सवेरा और नई शुरुआत आपका इंतजार कर रही है।
📌 प्रेरक संदेश:
पतझड़ के बाद ही पेड़ पर नई कोपलें फूटती हैं; हर अंत एक नए सृजन की तैयारी है। उदाहरण: जब रात होती है तो सूरज डूबता है ताकि संसार को विश्राम मिल सके, और अगली सुबह वह दोगुनी ऊर्जा के साथ नया प्रकाश लेकर लौटता है।
📅 दिवस 289 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.8 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्।।9.8।।
भावार्थ: अपनी प्रकृति (स्वभाव) को वश में करके, स्वभाव के बल से परवश हुए इस संपूर्ण प्राणी-समुदाय को मैं उनके कर्मों के अनुसार बार-बार उत्पन्न करता हूँ।
इंसान बाहर की दुनिया को दोष देता रहता है, लेकिन वास्तव में वह अपने ही स्वभाव (आदतों और संस्कारों) के वश में होकर बार-बार वही गलतियां दोहराता है और दुःखी होता है। जब तक आप अपनी प्रकृति और आदतों पर विजय नहीं पाएंगे, तब तक आप स्वतंत्र नहीं हो सकते।
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आज अपनी किसी ऐसी आदत (जैसे देर से उठना, टालमटोल करना या गुस्सा करना) को पहचानें जिसके आप गुलाम बन चुके हैं, और उस पर विवेक से नियंत्रण पाएं।
📌 प्रेरक संदेश:
जो अपने स्वभाव को नहीं बदलता, वह अपनी किस्मत कभी नहीं बदल सकता। उदाहरण: एक शराबी शराब पीने के बाद पछताता है, पर अगले दिन अपनी आदत के वश में होकर फिर वही गलती करता है; आदत का गुलाम मत बनिए, मालिक बनिए।
📅 दिवस 290 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.9 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु।।9.9।।
भावार्थ: हे धनंजय अर्जुन! उन सृष्टि-रचना आदि कर्मों में अनासक्त और उदासीन (साक्षी) की भांति स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म बांधते नहीं हैं।
परमात्मा पूरे ब्रह्मांड का संचालन करते हुए भी किसी अहंकार या लालसा में नहीं बंधते। इसी तरह जब हम दफ्तर, घर या समाज में बड़े-बड़े काम करते हुए भी यह याद रखते हैं कि 'मैं केवल एक माध्यम हूँ, कर्ता परमात्मा है', तो कोई भी काम तनाव या अहंकार का बंधन नहीं बनता।
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आज कोई बड़ा काम सफलता से पूरा होने पर अपनी पीठ खुद थपथपाने और अहंकारी होने के बजाय विनम्रता से कहें: 'ईश्वर की कृपा और टीम के सहयोग से यह संभव हुआ।'
📌 प्रेरक संदेश:
अहंकार कर्म को बंधन बना देता है; अनासक्ति कर्म को मोक्ष बना देती है। उदाहरण: एक न्यायाधीश जब निष्पक्ष होकर न्याय की कुर्सी पर बैठकर फैसला सुनाता है, तो उसका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता; वह केवल साक्षी भाव से अपना कर्तव्य करता है।
📅 दिवस 291 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.10 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।
भावार्थ: हे कुंतीपुत्र अर्जुन! मुझ अध्यक्ष (सर्वोपरि साक्षी) की देखरेख में प्रकृति चराचर सहित संपूर्ण जगत को रचती है; और इसी कारण से यह संसार-चक्र निरंतर घूम रहा है।
सच्चा नेता या प्रबंधक वह होता है जो हर काम में खुद टांग अड़ाकर चिल्लाने के बजाय एक शांत 'अध्यक्ष' की भांति सही व्यवस्था और वातावरण बनाता है, जहां सभी लोग अपनी पूरी क्षमता से काम कर सकें। अपने भीतर के साक्षी को पहचानना ही जीवन का संचालन है।
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आज यदि आप किसी टीम या परिवार के मुखिया हैं, तो हर छोटी बात पर टोका-टोकी करने के बजाय एक शांत मार्गदर्शक की तरह दूसरों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दें।
📌 प्रेरक संदेश:
सच्चा नेतृत्व अधिकार दिखाने में नहीं, बल्कि दूसरों को सक्षम बनाने में है। उदाहरण: एक कुशल क्रिकेट कप्तान मैदान पर खिलाड़ियों पर चिल्लाने के बजाय शांत रहकर सही फील्डिंग सजाता है और खिलाड़ियों में आत्मविश्वास भरता है।
📅 दिवस 292 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.11 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।
भावार्थ: मूर्ख लोग मेरे संपूर्ण प्राणियों के महान ईश्वर रूप परम श्रेष्ठ भाव को न जानते हुए, मनुष्य का साधारण शरीर धारण किए हुए मुझ परमात्मा का तिरस्कार करते हैं (मुझे साधारण मनुष्य समझते हैं)।
इंसान की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह किसी के कपड़े, रंग, जाति या साधारण वेशभूषा देखकर उसका मूल्यांकन करता है। किसी साधारण दिखने वाले व्यक्ति के भीतर भी महान प्रतिभा, दिव्यता और पवित्र आत्मा हो सकती है। बाहरी आवरण को नहीं, भीतरी तत्व को पहचानना सीखें।
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आज किसी भी साधारण दिखने वाले व्यक्ति (सफाईकर्मी, चपरासी, डिलीवरी बॉय) को कमतर न समझें; हर इंसान से सम्मान और आदर के साथ बात करें।
📌 प्रेरक संदेश:
हीरा कोयले की खान में भी हीरा ही रहता है; इंसान को उसके बाहरी रूप से नहीं, उसकी आत्मा से पहचानें। उदाहरण: जब सुकरात फटे पुराने कपड़े पहनकर बाजार में निकलते थे, तो मूर्ख उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन वे पूरे यूनान के सबसे बुद्धिमान दार्शनिक थे।
📅 दिवस 293 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.12 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।9.12।।
भावार्थ: व्यर्थ आशाओं वाले, निष्फल कर्म करने वाले, अज्ञानी और विक्षिप्त चित्त वाले वे अज्ञानी मनुष्य राक्षसी और आसुरी मोहनी प्रकृति (हिंसा, घमंड व स्वार्थ) का ही आश्रय लिए रहते हैं।
जब कोई व्यक्ति केवल दूसरों को लूटने, नीचा दिखाने और स्वार्थ सिद्ध करने में लगा रहता है, तो उसकी सारी उम्मीदें ('मोघाशा') और सारी मेहनत ('मोघकर्माणो') अंत में धूल में मिल जाती हैं। बुराई से बनाई गई इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।
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आज किसी भी गलत तरीके (झूठ, घूस, धोखाधड़ी) से मिलने वाले लाभ को साफ मना कर दें; बेईमानी से कमाया गया धन केवल बदनामी और अशांति लाता है।
📌 प्रेरक संदेश:
बेईमानी का फल मीठा लगता है पर अंत में जहर बन जाता है; ईमानदारी की रूखी रोटी ही सुकून देती है। उदाहरण: बड़े-बड़े घोटालेबाज जिन्होंने करोड़ों रुपये का गबन किया, अंत में जेल की कोठरी में अकेले और बदनाम होकर रोते हैं।
📅 दिवस 294 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.13 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।9.13।।
भावार्थ: परंतु हे पार्थ! दैवी प्रकृति (सत्य, दया, अहिंसा व प्रेम) का आश्रय लिए हुए महात्माजन मुझे सब प्राणियों का सनातन कारण और अविनाशी जानकर अनन्य मन से मेरी भक्ति करते हैं।
गीता के अनुसार महात्मा वह नहीं है जो केवल गेरुए वस्त्र पहन ले; महात्मा वह है जिसके भीतर दैवी गुण—दया, करुणा, क्षमा, उदारता और निस्वार्थ प्रेम—जीवंत हैं। जब आपका हृदय दूसरों के भले के लिए धड़कने लगता है, तब आप वास्तव में महात्मा बन जाते हैं।
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आज अपने भीतर के किसी दैवी गुण (जैसे क्षमा, विनम्रता या परोपकार) को विशेष रूप से अपने व्यवहार में उतारें; किसी की गलती को माफ करें।
📌 प्रेरक संदेश:
कपड़े बदलने से साधु नहीं बनते, विचार बदलने से महात्मा बनते हैं। उदाहरण: महात्मा गांधी ने कोई हथियार नहीं उठाया, लेकिन सत्य और अहिंसा के दैवी गुणों के बल पर दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को झुका दिया।
📅 दिवस 295 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.14 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।।9.14।।
भावार्थ: वे दृढ़ संकल्प वाले भक्तजन निरंतर मेरे दिव्य नामों और गुणों का कीर्तन करते हुए, मेरी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हुए, और मुझे भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हुए नित्य मुझसे जुड़े रहकर मेरी उपासना करते हैं।
कोई भी साधना या सफलता तब तक नहीं मिलती जब तक मनुष्य में 'दृढ़व्रत' (अटूट संकल्प) न हो। रोज थोड़ा अभ्यास, रोज ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और रोज अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना—यही दृढ़ता साधारण इंसान को महान बना देती है।
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आज अपने किसी महत्वपूर्ण लक्ष्य के प्रति एक दृढ़ संकल्प लें और आलस्य को पास न फटकने दें; दिन के अंत में ईश्वर को धन्यवाद देकर सोएं।
📌 प्रेरक संदेश:
संकल्प में विकल्प मत रखिए; जो ठान लिया, उसे पूरा करके ही दम लीजिए। उदाहरण: सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ़ संकल्प के कारण ही सैकड़ों रियासतों का विलय होकर एक अखंड भारत बन सका; उन्हें 'लौह पुरुष' ऐसे ही नहीं कहा जाता।
📅 दिवस 296 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.15 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।9.15।।
भावार्थ: दूसरे कितने ही साधक ज्ञानयज्ञ के द्वारा मुझ सर्वव्यापी परमात्मा की उपासना करते हैं—कोई अद्वैत भाव से (मैं और ईश्वर एक हैं), कोई विभिन्न रूपों में पृथक भाव से, तो कोई संपूर्ण विश्व में सर्वतोमुख विराट रूप में मेरी पूजा करते हैं।
ईश्वर की पूजा केवल धूप-दीप से नहीं होती; सद्ग्रंथों का गहरा अध्ययन करना, सत्य की खोज करना और ब्रह्मांड के नियमों को समझना भी सबसे बड़ा 'ज्ञानयज्ञ' है। जब एक वैज्ञानिक नई खोज करता है या शिक्षक निस्वार्थ पढ़ाता है, तो वह भी ईश्वर की उपासना कर रहा होता है।
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आज कम से कम 30 मिनट किसी गहरी ज्ञानवर्धक पुस्तक को पढ़ें या किसी नए विषय का अध्ययन करें; अपनी बुद्धि को अज्ञान से मुक्त करना ही ज्ञानयज्ञ है।
📌 प्रेरक संदेश:
विद्या और ज्ञान की साधना भी ईश्वर की साक्षात पूजा है। उदाहरण: डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दिन में 18-18 घंटे किताबों का अध्ययन किया; इसी ज्ञानयज्ञ के बल पर उन्होंने भारत को एक समतावादी और न्यायपूर्ण संविधान दिया।
📅 दिवस 297 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.16 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यं मग्निरहं हुतं च।।9.16।।
भावार्थ: श्रौत कर्म (शास्त्रोक्त कर्तव्य) मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, पितरों को दिया जाने वाला श्राद्ध-तर्पण मैं हूँ, औषध (जड़ी-बूटी व अन्न) मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घृत (हवन सामग्री) मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवन रूप क्रिया भी मैं ही हूँ।
जीवन में हम जो भी साधन प्रयोग करते हैं—दवाइयां, भोजन, वाणी और कर्म—उन सबके मूल में वही ईश्वरीय शक्ति काम कर रही है। जब हमें यह समझ आ जाता है कि दवा में ठीक करने की शक्ति और अन्न में तृप्ति देने वाली शक्ति परमात्मा ही है, तो हम हर वस्तु का आदर करने लगते हैं।
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आज भोजन करते समय या दवाई लेते समय मन में यह भाव लाएं कि यह प्रकृति की औषधि है जो शरीर को स्वस्थ कर रही है; भोजन का एक दाना भी बर्बाद न करें।
📌 प्रेरक संदेश:
अन्न और औषधि जीवनदान हैं, इनका सम्मान ईश्वर का सम्मान है। उदाहरण: एक चिकित्सक जब मरीज को दवा देता है तो वह जानता है कि दवा केवल माध्यम है, घाव भरने की वास्तविक शक्ति प्रकृति और परमात्मा की ही है।
📅 दिवस 298 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.17 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च।।9.17।।
भावार्थ: इस संपूर्ण जगत का पिता, माता, धारण-पोषण करने वाला और पितामह (दादा) मैं ही हूँ; जानने योग्य पवित्र तत्व, ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
ईश्वर हमारे सबसे निकट का संबंधी है—वह पिता की तरह अनुशासन देता है, मां की तरह असीम वात्सल्य और क्षमा देता है, और दादा की तरह आशीर्वाद देता है। जब ब्रह्मांड का स्वामी हमारा अपना है, तो हमें अनाथ, अकेला या असहाय महसूस करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
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आज अपने माता-पिता और बुजुर्गों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें; उनके माध्यम से परमात्मा के वात्सल्य और सुरक्षा को महसूस करें।
📌 प्रेरक संदेश:
माता-पिता धरती पर साक्षात ईश्वर का रूप हैं; उनकी सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। उदाहरण: भगवान श्रीराम ने पिता के वचन और माता के सम्मान के लिए 14 वर्ष का वनवास हंसते हुए स्वीकार किया; माता-पिता का आदर करने वाला सदा विजयी होता है।
📅 दिवस 299 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.18 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।9.18।।
भावार्थ: परम गति, भरण-पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी, सच्चा निवास, शरण लेने योग्य, बिना स्वार्थ के हितैषी मित्र (सुहृत्), उत्पत्ति और प्रलय, सबका आधार, निधान (भंडार) और अविनाशी बीज—मैं ही हूँ।
दुनिया के मित्र अक्सर मतलब और स्वार्थ से जुड़ते हैं, जब पैसा या पद चला जाता है तो छोड़ देते हैं। लेकिन परमात्मा 'सुहृत्' हैं—अर्थात ऐसे मित्र जो बिना किसी स्वार्थ के केवल हमारा भला चाहते हैं। अपने मन की सारी बातें उस सच्चे मित्र से साझा करें।
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आज जब कोई चिंता या अकेलापन सताए, तो किसी झूठे सहारे के बजाय आंखें बंद करके परमात्मा को अपना सबसे पक्का मित्र मानकर उनसे बात करें।
📌 प्रेरक संदेश:
दुनिया साथ छोड़ सकती है, पर ईश्वर कभी आपका हाथ नहीं छोड़ता। उदाहरण: द्रौपदी की सभा में जब सभी बड़े-बड़े महारथी सिर झुकाए बैठे थे, तब केवल उनके सच्चे सखा श्रीकृष्ण ने ही उनकी लाज और सम्मान की रक्षा की थी।
📅 दिवस 300 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 9.19 (राजविद्याराजगुह्ययोग)
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।9.19।।
भावार्थ: हे अर्जुन! मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता हूँ और मैं ही बरसाता हूँ; अमृत और मृत्यु भी मैं ही हूँ, तथा सत (प्रकट सत्य) और असत (अव्यक्त) भी मैं ही हूँ।
तेज धूप (तपिश) भी जरूरी है ताकि फसलें पकें, और बारिश भी जरूरी है ताकि धरती शीतल हो। इसी तरह हमारे जीवन में सुख अमृत की तरह है और दुःख तपस्या की तरह। जब हम दोनों को ईश्वर का विधान मानकर स्वीकार कर लेते हैं, तो मन कभी विचलित नहीं होता।
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आज यदि कोई कठिन परिस्थिति या दुःख सामने आए, तो रोने के बजाय कहें: 'यह मुझे मजबूत बनाने के लिए आई है' और धैर्यपूर्वक उसका सामना करें।
📌 प्रेरक संदेश:
धूप और बारिश दोनों से ही सुंदर इंद्रधनुष बनता है; संघर्ष ही जीवन को निखारता है। उदाहरण: सोने को जब आग में तपाया जाता है, तभी उसका मैल कटता है और वह कुंदन बनकर चमकता है; कठिनाइयों को अपने निखार का अवसर समझें।