📅 दिवस 316 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.1 (सम्मान)
श्री भगवानुवाच
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।।10.1।।
भावार्थ: श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो अर्जुन ! मेरे परम वचनको तुम फिर भी सुनो, जिसे मैं तुम्हारे हितकी कामनासे कहूँगा; क्योंकि तुम मेरेमें अत्यन्त प्रेम रखते हो।
[जीवन दृष्टि - सम्मान]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
किसी दावे का स्रोत जाँचे बिना उसे आगे न भेजें। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — क्योंकि भरोसा रोज़ बनता है।)
📅 दिवस 317 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.2 (निरंतरता)
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।।10.2।।
भावार्थ: मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं और न महर्षि; क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ।
[जीवन दृष्टि - निरंतरता]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
क्रोध बढ़ते समय दस सेकंड रुकें। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — तुरंत परिणाम की जिद किए बिना।)
📅 दिवस 318 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.3 (जवाबदेही)
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।10.3।।
भावार्थ: जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।
[जीवन दृष्टि - जवाबदेही]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद दें जिसकी मेहनत अक्सर अनदेखी होती है। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — और दूसरों की गरिमा बनाए रखते हुए।)
📅 दिवस 319 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.4 (शांत कर्म)
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।।10.4।।
भावार्थ: ।।10.4 -- 10.5।। बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलग-अलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।
[जीवन दृष्टि - शांत कर्म]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
ध्यान भटकाने वाली चीज़ें देखने से पहले एक ज़रूरी काम पूरा करें। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — फिर अनुभव से सीखें।)
📅 दिवस 320 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.5 (विवेक)
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः।।10.5।।
भावार्थ: ।।10.4 -- 10.5।। बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलग-अलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।
[जीवन दृष्टि - विवेक]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
किसी असफलता से मिली सीख पाँच मिनट लिखें। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — भले ही आसान रास्ता आकर्षक लगे।)
📅 दिवस 321 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.6 (आत्मसंयम)
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः।।10.6।।
भावार्थ: सात महर्षि और उनसे भी पूर्वमें होनेवाले चार सनकादि तथा चौदह मनु -- ये सब-के-सब मेरे मनसे पैदा हुए हैं और मेरेमें भाव (श्रद्धाभक्ति) रखनेवाले हैं, जिनकी संसारमें यह सम्पूर्ण प्रजा है।
[जीवन दृष्टि - आत्मसंयम]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
किसी दावे का स्रोत जाँचे बिना उसे आगे न भेजें। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — और सुधार की गुंजाइश रखें।)
📅 दिवस 322 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.7 (ईमानदारी)
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।।10.7।।
भावार्थ: जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है; इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
[जीवन दृष्टि - ईमानदारी]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
क्रोध बढ़ते समय दस सेकंड रुकें। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — अपनी यात्रा की तुलना दूसरों से किए बिना।)
📅 दिवस 323 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.8 (धैर्य)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।।10.8।।
भावार्थ: मैं संसारमात्रका प्रभव (मूलकारण) हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है -- ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही श्रद्धा-प्रेम रखते हुए बुद्धिमान् भक्त मेरा ही भजन करते हैं -- सब प्रकारसे मेरे ही शरण होते हैं।
[जीवन दृष्टि - धैर्य]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद दें जिसकी मेहनत अक्सर अनदेखी होती है। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — संदेश आगे भेजने से पहले।)
📅 दिवस 324 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.9 (सेवा)
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।10.9।।
भावार्थ: । मेरेमें चित्तवाले, मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे गुण, प्रभाव आदिको जानते हुए और उनका कथन करते हुए ही नित्य-निरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं और मेरेमें प्रेम करते हैं।
[जीवन दृष्टि - सेवा]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
ध्यान भटकाने वाली चीज़ें देखने से पहले एक ज़रूरी काम पूरा करें। (संदेश: सही काम चुपचाप करें — साहस और करुणा दोनों के साथ।)
📅 दिवस 325 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.10 (सीखना)
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।10.10।।
भावार्थ: उन नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है।
[जीवन दृष्टि - सीखना]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
किसी असफलता से मिली सीख पाँच मिनट लिखें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — खासकर तब, जब कोई देख न रहा हो।)
📅 दिवस 326 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.11 (साहस)
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।10.11।।
भावार्थ: उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।
[जीवन दृष्टि - साहस]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
किसी दावे का स्रोत जाँचे बिना उसे आगे न भेजें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — एक छोटे निर्णय से शुरुआत करें।)
📅 दिवस 327 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.12 (न्याय)
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।।10.12।।
भावार्थ: ।।10.12 -- 10.12।। अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।
[जीवन दृष्टि - न्याय]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
क्रोध बढ़ते समय दस सेकंड रुकें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — अपने कर्मों को बोलने दें।)
📅 दिवस 328 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.13 (कृतज्ञता)
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।।10.13।।
भावार्थ: ।।10.12 -- 10.13।। अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।
[जीवन दृष्टि - कृतज्ञता]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद दें जिसकी मेहनत अक्सर अनदेखी होती है। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — क्योंकि भरोसा रोज़ बनता है।)
📅 दिवस 329 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.14 (अनुशासन)
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन् व्यक्ितं विदुर्देवा न दानवाः।।10.14।।
भावार्थ: हे केशव ! मेरेसे आप जो कुछ कह रहे हैं, यह सब मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन् ! आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं।
[जीवन दृष्टि - अनुशासन]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
ध्यान भटकाने वाली चीज़ें देखने से पहले एक ज़रूरी काम पूरा करें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — तुरंत परिणाम की जिद किए बिना।)
📅 दिवस 330 / 365
📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.15 (विनम्रता)
स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।।10.15।।
भावार्थ: हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।
[जीवन दृष्टि - विनम्रता]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग
किसी असफलता से मिली सीख पाँच मिनट लिखें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — और दूसरों की गरिमा बनाए रखते हुए।)