दैनिक सद्विचार व पावन श्लोक (365 दिवस)

वर्ष के प्रत्येक दिन के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के पावन श्लोक, सरल हिंदी भावार्थ और जीवन में उतारने योग्य व्यावहारिक सीख।

कुल 365 श्लोक उपलब्ध • पृष्ठ 23 / 25
📅 दिवस 331 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.16 (लचीलापन)
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।।10.16।।
भावार्थ: जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं।

[जीवन दृष्टि - लचीलापन]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

किसी दावे का स्रोत जाँचे बिना उसे आगे न भेजें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — फिर अनुभव से सीखें।)

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📅 दिवस 332 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.17 (एकाग्रता)
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।10.17।।
भावार्थ: हे योगिन् ! हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ ? और हे भगवन् ! किन-किन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात् किन-किन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ ?

[जीवन दृष्टि - एकाग्रता]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

क्रोध बढ़ते समय दस सेकंड रुकें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — भले ही आसान रास्ता आकर्षक लगे।)

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📅 दिवस 333 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.18 (उदारता)
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।।10.18।।
भावार्थ: हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।

[जीवन दृष्टि - उदारता]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद दें जिसकी मेहनत अक्सर अनदेखी होती है। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — और सुधार की गुंजाइश रखें।)

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📅 दिवस 334 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.19 (सत्य की खोज)
श्री भगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।।10.19।।
भावार्थ: श्रीभगवान् बोले -- हाँ, ठीक है। मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे (संक्षेपसे) कहूँगा; क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ ! मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है।

[जीवन दृष्टि - सत्य की खोज]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

ध्यान भटकाने वाली चीज़ें देखने से पहले एक ज़रूरी काम पूरा करें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — अपनी यात्रा की तुलना दूसरों से किए बिना।)

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📅 दिवस 335 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.20 (क्षमा)
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।10.20।।
भावार्थ: हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ।

[जीवन दृष्टि - क्षमा]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

किसी असफलता से मिली सीख पाँच मिनट लिखें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — संदेश आगे भेजने से पहले।)

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📅 दिवस 336 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.21 (जिम्मेदारी)
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।।10.21।।
भावार्थ: मैं अदितिके पुत्रोंमें विष्णु (वामन) और प्रकाशमान वस्तुओंमें किरणोंवाला सूर्य हूँ। मैं मरुतोंका तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ।

[जीवन दृष्टि - जिम्मेदारी]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

किसी दावे का स्रोत जाँचे बिना उसे आगे न भेजें। (संदेश: बदलाव में भी स्थिर रहें — साहस और करुणा दोनों के साथ।)

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📅 दिवस 337 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.22 (समभाव)
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।10.22।।
भावार्थ: मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, देवताओंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियोंमें मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ।

[जीवन दृष्टि - समभाव]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

क्रोध बढ़ते समय दस सेकंड रुकें। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — खासकर तब, जब कोई देख न रहा हो।)

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📅 दिवस 338 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.23 (दयालुता)
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्।।10.23।।
भावार्थ: रुद्रोंमें शंकर और यक्ष-राक्षसोंमें कुबेर मैं हूँ।वसुओंमें पावक (अग्नि) और शिखरवाले पर्वतोंमें सुमेरु मैं हूँ।

[जीवन दृष्टि - दयालुता]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद दें जिसकी मेहनत अक्सर अनदेखी होती है। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — एक छोटे निर्णय से शुरुआत करें।)

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📅 दिवस 339 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.24 (संयम)
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः।।10.24।।
भावार्थ: हे पार्थ ! पुरोहितोंमें मुख्य बृहस्पतिको मेरा स्वरूप समझो। सेनापतियोंमें स्कन्द और जलाशयोंमें समुद्र मैं हूँ।

[जीवन दृष्टि - संयम]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

ध्यान भटकाने वाली चीज़ें देखने से पहले एक ज़रूरी काम पूरा करें। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — अपने कर्मों को बोलने दें।)

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📅 दिवस 340 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.25 (आत्मचिंतन)
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः।।10.25।।
भावार्थ: महर्षियोंमें भृगु और वाणियों-(शब्दों-) में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ। सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ।

[जीवन दृष्टि - आत्मचिंतन]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

किसी असफलता से मिली सीख पाँच मिनट लिखें। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — क्योंकि भरोसा रोज़ बनता है।)

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📅 दिवस 341 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.26 (स्पष्ट वाणी)
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।।10.26।।
भावार्थ: सम्पूर्ण वृक्षोंमें पीपल, देवर्षियोंमें नारद, गन्धर्वोंमें चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल मुनि मैं हूँ।

[जीवन दृष्टि - स्पष्ट वाणी]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

किसी दावे का स्रोत जाँचे बिना उसे आगे न भेजें। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — तुरंत परिणाम की जिद किए बिना।)

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📅 दिवस 342 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.27 (विवेकपूर्ण चुनाव)
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्।।10.27।।
भावार्थ: घोड़ोंमें अमृतके साथ समुद्रसे प्रकट होनेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेको, श्रेष्ठ हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथीको और मनुष्योंमें राजाको मेरी विभूति मानो।

[जीवन दृष्टि - विवेकपूर्ण चुनाव]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

क्रोध बढ़ते समय दस सेकंड रुकें। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — और दूसरों की गरिमा बनाए रखते हुए।)

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📅 दिवस 343 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.28 (निरंतर प्रयास)
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।।10.28।।
भावार्थ: आयुधोंमें वज्र और धेनुओंमें कामधेनु मैं हूँ। सन्तान-उत्पत्तिका हेतु कामदेव मैं हूँ और सर्पोंमें वासुकि मैं हूँ।

[जीवन दृष्टि - निरंतर प्रयास]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद दें जिसकी मेहनत अक्सर अनदेखी होती है। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — फिर अनुभव से सीखें।)

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📅 दिवस 344 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.29 (करुणा)
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितृ़णामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।।10.29।।
भावार्थ: नागोंमें अनन्त (शेषनाग) और जल-जन्तुओंका अधिपति वरुण मैं हूँ। पितरोंमें अर्यमा और शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ।

[जीवन दृष्टि - करुणा]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

ध्यान भटकाने वाली चीज़ें देखने से पहले एक ज़रूरी काम पूरा करें। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — भले ही आसान रास्ता आकर्षक लगे।)

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📅 दिवस 345 / 365 📜 श्रीमद्भगवद्गीता 10.30 (सही निर्णय)
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।10.30।।
भावार्थ: दैत्योंमें प्रह्लाद और गणना करनेवालोंमें काल मैं हूँ । पशुओंमें सिंह और पक्षियोंमें गरुड मैं हूँ।

[जीवन दृष्टि - सही निर्णय]: दुनिया की उत्कृष्टता और अच्छाई पहचानें; प्रशंसा को कृतज्ञता और सीख में बदलें।
💡 व्यावहारिक जीवन में प्रयोग

किसी असफलता से मिली सीख पाँच मिनट लिखें। (संदेश: आवेग से ऊपर आत्मसंयम चुनें — और सुधार की गुंजाइश रखें।)

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