सबका ढोल
सामुदायिक उत्सवों में इस्तेमाल होने वाला ढोल इसलिए खराब हो जाता है क्योंकि हर कोई सोचता है कि कोई और उसे रखेगा। पड़ोसी देखभाल की बारी और छोटा मरम्मत-कोष बनाते हैं, ताकि उपयोग के साथ ज़िम्मेदारी भी रहे।
प्रकृति हमारी माता है जो हमें जीवन देती है। वृक्षों, नदियों और वन्यजीवों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का पावन कर्तव्य है।
सामुदायिक उत्सवों में इस्तेमाल होने वाला ढोल इसलिए खराब हो जाता है क्योंकि हर कोई सोचता है कि कोई और उसे रखेगा। पड़ोसी देखभाल की बारी और छोटा मरम्मत-कोष बनाते हैं, ताकि उपयोग के साथ ज़िम्मेदारी भी रहे।
एक मछुआरे को उम्मीद से कम मछलियाँ मिलती हैं, फिर भी वह प्रजनन क्षेत्र की छोटी मछलियों को नहीं पकड़ता। वह और पड़ोसी ऐसे निष्पक्ष, स्वैच्छिक तरीकों पर सहमत होते हैं जो आज की आजीविका और भविष्य की उपलब्धता दोनों बचाते हैं।
निवासी गर्म सड़कों और छायादार रास्तों का नक्शा बनाते हैं। वे पुराने पेड़ों की रक्षा करते हैं और नई छाया के लिए उपयुक्त स्थान चुनते हैं।
एक कक्षा पुनः उपयोग होने वाले डिब्बों, उचित मात्रा, पानी भरने की जगह और सारा कचरा वापस ले जाने की योजना के साथ पिकनिक बनाती है।
एक मोहल्ला कभी-कभार उपयोग होने वाले औज़ारों के लिए साझा भंडार बनाता है। उधार का रिकॉर्ड, सुरक्षा जाँच और मरम्मत से सामान सभी के लिए उपलब्ध रहता है।
एक स्कूल बीज-साझा केंद्र शुरू करता है, जहाँ परिवार स्थानीय रूप से उपयुक्त बीज जमा करते, बाँटते और लिखते हैं कि कौन-से बीज अच्छी तरह उगते हैं।
शहर की एक पॉश बहुमंजिला इमारत में रहने वाला पंद्रह वर्षीय संपन्न छात्र रोहित चौबीसों घंटे मिलने वाले नल के मीठे पानी को अपनी बपौती समझता था। एक रात अपने बगीचे में पाइप से पानी देने के बाद वह वीडियो गेम खेलने की हड़बड़ाहट में मुख्य नल को पूरा खुला छोड़कर चला गया। पूरी रात हजारों लीटर स्वच्छ, पीने योग्य पानी आँगन में बहकर गंदे नाले में समा गया। सुबह जब पिताजी ने उसे इस भयानक बर्बादी पर डांटा, तो रोहित ने अत्यंत लापरवाही और अहंकार से कहा—'पापा! केवल थोड़ा सा पानी ही तो बहा है, हम पानी का बिल भरते हैं, इसमें इतना गुस्सा होने की क्या बात है?' बेटे के इस संवेदनहीन अहंकार को तोड़ने के लिए पिताजी उसी सप्ताहांत रोहित को बिना कुछ बताए बुंदेलखंड के एक सुदूर, सूखाग्रस्त गाँव ले गए। वहाँ रोहित ने अपनी आँखों से देखा कि 47 डिग्री की चिलचिलाती धूप में बूढ़ी माताएं और नन्हीं बच्चियाँ फटे पैरों से अंगारों जैसी तपती जमीन पर चार मील पैदल चलकर कुएँ से मटमैला पानी लाती थीं, और आधी बाल्टी पानी के लिए घंटों कतार में झगड़ती थीं। एक गरीब किसान अपनी प्यासी गाय और सूखी फसलों को देखकर फूट-फूटकर रो रहा था। उस वीभत्स दृश्य ने रोहित के अंतर्मन को चीर कर रख दिया। उसने हिसाब लगाया कि जो पानी उसने एक रात में बहा दिया था, उससे उस पूरे गाँव की एक सप्ताह की प्यास बुझ सकती थी! रोहित आत्मग्लानि के आंसुओं में डूब गया। उसने अपने ग्रीष्मकालीन अवकाश में गाँव में रहकर वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) के गड्ढे खोदे और शहर लौटकर अपनी पूरी सोसायटी में जल संरक्षण का महा-अभियान चलाया। यह कथा सिखाती है कि जल केवल पैसे से खरीदा जाने वाला पदार्थ नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा दिया गया जीवन का साक्षात अमृत है; समृद्धि में जल की बर्बादी करना उन लाखों प्यासे लोगों के प्रति अक्षम्य अपराध है जो बूँद-बूँद के लिए तरस रहे हैं।
दिल्ली से सटे एक तेजी से विकसित हो रहे कंक्रीट के उपनगर में एक खाली लावारिस भूखंड (प्लॉट) था जो वर्षों से पूरी कॉलोनी के लिए कचरा, प्लास्टिक, सड़े हुए मलबे और आवारा सुअरों का भयानक डंपिंग यार्ड बन चुका था। चारों ओर दुर्गंध और मच्छरों का साम्राज्य था; कॉलोनी के सभी निवासी प्रशासन और नगर निगम को कोसते रहते थे, परंतु कोई भी उस गंदगी को साफ करने के लिए एक कदम आगे नहीं बढ़ाता था। ग्यारह वर्षीय नन्हीं छात्रा मीरा ने एक दिन मलबे के एक जहरीले ढेर के बीच सीमेंट की टूटी दरार से झांकते हुए एक नन्हे, कोमल नीम के पौधे (सैपलिंग) को संघर्ष करते देखा। मीरा के मन में उस नन्हे जीवन के प्रति असीम वात्सल्य जाग उठा। उसने उस पौधे को बचाने का संकल्प लिया। जब मीरा ने अपने नन्हे हाथों से मलबे को हटाना शुरू किया, तो पड़ोसियों ने उसका उपहास उड़ाया—'अरे पगली लड़की! इस गंदे नाले में यह पौधा दो दिन में मर जाएगा, तू यहाँ सफाई वाली बनने क्यों आई है?' मीरा ने किसी के तानों की परवाह नहीं की। उसने पुराने बाँस की खपच्चियों से पौधे के चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाया, प्रतिदिन सुबह-शाम बाल्टियों में पानी ढोकर लाई, और जब चिलचिलाती धूप ने पत्तियों को झुलसाने की कोशिश की, तो उसने पुरानी प्लास्टिक की बोतलों से बूँद-बूँद सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) का जुगाड़ तैयार किया। मीरा की इस अडिग साधना और निस्वार्थ प्रेम को देखकर मोहल्ले के एक सेवानिवृत्त कर्नल और कुछ महिलाओं का हृदय पिघल गया। धीरे-धीरे एक बच्ची की प्रेरणा ने एक महा-आंदोलन का रूप ले लिया। पूरे मोहल्ले ने मिलकर श्रमदान किया, कचरे के उस भयानक पहाड़ को साफ किया और वहाँ नीम, पीपल और अमलतास के डेढ़ सौ पेड़ रोपकर एक भव्य 'हरित वाटिका' का निर्माण किया। सात वर्ष बाद जब वह नीम का पौधा एक विशाल, छायादार और औषधीय वृक्ष बनकर आकाश को चूमने लगा, तो पूरी कॉलोनी ने मीरा को 'वन-कन्या' की उपाधि दी। यह कथा सिखाती है कि बंजर और प्रदूषित दुनिया में बदलाव लाने के लिए केवल शिकायतों का शोर मचाना व्यर्थ है; जब एक अकेला व्यक्ति भी प्रेम और निष्ठा से जीवन के एक नन्हे अंकुर की रक्षा करने का बीड़ा उठा लेता है, तो वह पूरी प्रकृति को पुनर्जीवित करने का मार्ग प्रशस्त कर देता है।
वाराणसी के एक प्राचीन और संकरे मोहल्ले 'गोपाल गली' की स्थिति अत्यंत दयनीय और नारकीय थी। गली के दोनों ओर खुली नालियाँ प्लास्टिक के गिलासों से पटी पड़ी थीं, दीवारों पर पान-गुटखे की पीक के लाल धब्बे थे और हर घर के बाहर कचरे के ढेर सड़ रहे थे। मोहल्ले के लोग शाम को चबूतरों पर बैठकर नगर निगम और सफाईकर्मियों को गालियाँ देते थे, परंतु अगली ही सुबह अपने घरों की बालकनी से कचरे की थैलियाँ सीधे गली के बीचों-बीच फेंक देते थे। ग्यारहवीं कक्षा की मेधावी छात्रा दीपा ने इस पाखंड और गंदगी के विरुद्ध आवाज उठाने का निर्णय लिया। उसने किसी से बहस नहीं की, न कोई भाषण दिया। उसने अपनी बचत से एक मजबूत झाड़ू, दस्ताने और कचरे का बड़ा डस्टबिन खरीदा। अगली सुबह भोर के पाँच बजे, जब पूरा मोहल्ला सो रहा था, दीपा ने अकेले उस बदबूदार गली में उतरकर झाड़ू लगाना शुरू किया। शुरुआत में मोहल्ले के लोगों ने उसका उपहास उड़ाया—'देखो, मास्टर जी की बेटी जमादारिन बन गई है!' परंतु दीपा ने अपना सिर नहीं झुकाया। वह प्रतिदिन बिना रुके, शांत भाव से दो घंटे तक गली का कचरा साफ करती रही और दीवारों से पान के दाग खुरचती रही। चौथे दिन मोहल्ले के एक बुजुर्ग शिक्षक और परचून के दुकानदार का जमीर जाग उठा; वे भी अपने घरों से झाड़ू लेकर दीपा के साथ खड़े हो गए। देखते ही देखते एक लड़की की मूक क्रांति ने पूरे मोहल्ले का कायाकल्प कर दिया। मोहल्ले के सभी युवकों और परिवारों ने 'स्वच्छ गोपाल गली अभियान' शुरू किया; नालियों पर जालियाँ लगाई गईं, दीवारों पर सुंदर नैतिक सूक्तियाँ और मधुबनी चित्रकारी की गई और कचरा फेंकने वालों पर सामाजिक जुर्माना तय किया गया। मात्र एक महीने के भीतर वह बदबूदार गली पूरे शहर की सबसे सुंदर और स्वच्छ 'आदर्श गली' बन गई और नगर निगम ने दीपा को 'स्वच्छता रत्न' से सम्मानित किया। यह कथा सिखाती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए दूसरों को उपदेश देने के बजाय स्वयं शुरुआत करनी पड़ती है; जब कोई व्यक्ति अपने हाथों में झाड़ू थामकर निष्काम सेवा में उतरता है, तो उसका आचरण पूरे समाज के सोए हुए विवेक को जगा देता है।
पुणे की एक विशाल आवासीय सोसायटी में प्रतिवर्ष गणेशोत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता था। परंतु उत्सव समाप्त होते ही सोसायटी का प्रांगण और पास की पवित्र मुथा नदी थर्माकोल के पहाड़ों, प्लास्टिक की डिस्पोजल प्लेटों और प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) की टूटी मूर्तियों के जहरीले मलबे से पट जाती थी जिससे सैकड़ों मछलियाँ तड़पकर मर जाती थीं। बारहवीं कक्षा के पर्यावरण प्रेमी छात्र अनिरुद्ध का हृदय इस धार्मिक प्रदूषण को देखकर रो पड़ा। उसने सोचा कि भगवान गणेश, जो प्रकृति के साक्षात देवता हैं, क्या वे अपनी पूजा के नाम पर इस विनाश से प्रसन्न हो सकते हैं? अनिरुद्ध ने सोसायटी की प्रबंध समिति के सामने एक साहसिक प्रस्ताव रखा—'जीरो-वेस्ट इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव' (शून्य-कचरा उत्सव)। उसने रासायनिक रंगों की जगह शुद्ध शाडू माटी की ऐसी मूर्ति स्थापित करने का सुझाव दिया जिसके भीतर तुलसी और गेंदे के बीज समाहित हों; प्लास्टिक की जगह पलाश और सुपारी के पत्तों की पारंपरिक पत्तलों (पत्रावली) का उपयोग; और पूजा के सभी फूलों से जैविक खाद बनाने की योजना। शुरुआत में पुरातनपंथी और हठीले सदस्यों ने उसका उपहास उड़ाया कि 'यह लड़कों का चोंचला है, इससे उत्सव का मजा किरकिरा हो जाएगा!' परंतु अनिरुद्ध ने हाथ जोड़कर सभी को समझाया और अपनी योजना का एक सजीव मॉडल बनाकर दिखाया। जब समिति मान गई, तो उस वर्ष पूरे शहर ने एक जादुई उत्सव देखा: विसर्जन नदी में करने के बजाय सोसायटी के बड़े टैंक में हुआ, जहाँ मूर्ति घुल गई और उस पवित्र मिट्टी को सोसायटी के बगीचे में डाला गया। तीन महीने बाद उसी मिट्टी से सैकड़ों गेंदे के स्वर्णिम फूल और तुलसी के पौधे खिल उठे! नदी स्वच्छ रही, कचरे का एक तिनका भी बाहर नहीं गया और सोसायटी को मुख्यमंत्री द्वारा 'हरित धरोहर सम्मान' से अलंकृत किया गया। यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति प्रकृति का विनाश करके नहीं, बल्कि उसका संरक्षण करके सिद्ध होती है; त्यौहार वही पवित्र है जो जाने के बाद धरती पर कचरा नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए आशीर्वाद छोड़ जाए।
शहर के ऐतिहासिक स्वतंत्रता सेनानी स्मृति पार्क में बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों के बैठने के लिए सागौन की लकड़ी और ढलवां लोहे (कास्ट आयरन) की मजबूत हेरिटेज बेंचें लगी हुई थीं। ग्यारहवीं कक्षा के चार बिगड़ैल और उपद्रवी छात्र—मयंक, विक्की, हर्ष और रोहन—शाम को पार्क में आते थे और अपनी ताकत का नशा दिखाने के लिए उन सरकारी बेंचों पर जूतों समेत कूदते, भारी पत्थर पटकते और उनके बोल्ट ढीले करते थे। जब मयंक ने एक दिन अपने दोस्तों को रोकने की कोशिश की, तो विक्की ने हंसते हुए कहा—'अरे डरपोक! यह सरकारी माल है, किसी के बाप की जागीर नहीं है; टूटेगी तो सरकार दूसरी लगा देगी, तुझे क्या दर्द हो रहा है?' उनकी इस बदमाशी के कारण पार्क की मुख्य छायादार बेंच की लकड़ी बीच से चटक गई और उसके लोहे के पेंच निकल गए। अगली सुबह जब अस्सी वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक पंडित दीनानाथ जी, जो हृदय रोगी थे और लाठी के सहारे पार्क में टहलने आते थे, थककर उस बेंच पर बैठे, तो वह टूटी हुई बेंच भयानक आवाज के साथ ढह गई। वृद्ध दीनानाथ जी सीधे नुकीले पत्थरों पर गिरे; उनका कूल्हा टूट गया और सिर से खून की धार बह निकली। मयंक उस समय पार्क के पास से गुजर रहा था। उसने जब उस असहाय वृद्ध को दर्द से तड़पते और एम्बुलेंस में ले जाते देखा, तो उसकी आत्मा काँप उठी—'सरकारी संपत्ति किसी लावारिस की नहीं, हम सबकी अपनी साझी धरोहर होती है; हमारे एक घटिया मजाक ने एक बेगुनाह बुजुर्ग की हड्डियाँ तोड़ दीं!' मयंक आत्मग्लानि की आग में जल उठा। उसने अपने पिता के सामने रोते हुए अपना अपराध स्वीकार किया। मयंक ने अपने तीनों दोस्तों को ललकारा और उन्हें उनके अपराध का बोध कराया। चारों ने मिलकर अपने छह महीने के पॉकेट मनी से नई मजबूत लकड़ी, लोहे के बोल्ट और पेंट खरीदा। उन्होंने पूरे एक सप्ताह तक पार्क में पसीना बहाकर न केवल उस टूटी बेंच की मरम्मत की, बल्कि पार्क की सभी बीस बेंचों को मजबूत करके नए रंग-रोगन से चमका दिया और उस पर लिख दिया—'यह आपकी अपनी धरोहर है, इसका सम्मान करें।' जब पंडित दीनानाथ जी अस्पताल से स्वस्थ होकर लौटे और उन्होंने उन युवाओं का यह प्रायश्चित देखा, तो उन्होंने उन्हें गले से लगा लिया। यह कथा सिखाती है कि सार्वजनिक संपत्ति पर हर नागरिक का साझा अधिकार और उसे सुरक्षित रखने का पवित्र कर्तव्य होता है; सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना अपने ही देश और समाज के साथ विश्वासघात है।
आधुनिक 'उपयोग करो और फेंको' (Use and Throw) की उपभोक्तावादी संस्कृति में पला-बढ़ा दस वर्षीय बालक कबीर किसी भी वस्तु का आदर करना नहीं जानता था। उसके पास खिलौनों, गैजेट्स और कपड़ों का अंबार लगा था; जब भी कोई खिलौना थोड़ा सा खराब होता या टूट जाता, तो कबीर उसे तुरंत कूड़ेदान में फेंक देता और नए खिलौने के लिए हठ करने लगता था। एक दिन उसके जन्मदिन पर मिले सबसे प्रिय और महंगे रिमोट कंट्रोल मॉन्स्टर ट्रक का पहिया और एक्सल सोफे से टकराने के कारण टूट गया। कबीर ने आदत के अनुसार गुस्से में चिल्लाते हुए उस महंगे खिलौने को कूड़ेदान में पटक दिया और अपने पिताजी से नया ट्रक खरीदने की जिद करने लगा। उसके वयोवृद्ध दादाजी, जो भारतीय रेलवे के एक सेवानिवृत्त मुख्य मैकेनिकल इंजीनियर थे, ने कबीर की इस बर्बर मानसिकता को गहराई से देखा। दादाजी ने उस टूटे हुए खिलौने को कूड़ेदान से निकाला और कबीर का हाथ पकड़कर उसे अपने घर की छोटी सी गैराज कार्यशाला (वर्कशॉप) में ले गए। दादाजी ने उसे जीवन का सबसे महान संस्कार सिखाया—'कबीर बेटा! हमारे समय में जब कोई चीज टूटती थी, तो हम उसे फेंकते नहीं थे; हम बैठकर उसे ठीक (रिपेयर) करते थे—चाहे वह कोई खिलौना हो, कोई मशीन हो, या हमारा कोई रिश्ता हो!' दादाजी ने कबीर के हाथों में छोटे पेचकस, प्लास और सोल्डरिंग आयरन थमाए। अगले तीन दिनों तक दादाजी और पोते ने मिलकर उस खिलौने को खोला, पीतल का नया एक्सल खराद पर काटा, गियरों में ग्रीस लगाया और टूटी बॉडी को जोड़कर उस पर नया चमकदार लाल पेंट किया। जब वह खिलौना बनकर तैयार हुआ, तो वह पहले से भी दोगुना तेज, मजबूत और सुंदर चलने लगा! उस खिलौने को अपनी मेहनत से ठीक होते देखकर कबीर के मन में कृतज्ञता और निर्माण का ऐसा अभूतपूर्व आनंद जगा जिसकी तुलना नया खिलौना खरीदने की क्षणिक खुशी कभी नहीं कर सकती थी। कुछ ही दिनों बाद जब उसकी माताजी का पुराना रीडिंग लैंप खराब हुआ, तो कबीर ने उसे फेंकने के बजाय खुद बैठकर उसके तार जोड़े और उसे ठीक कर दिया। कबीर की इस बदली हुई दृष्टि ने उसके पूरे जीवन को कृतज्ञता, धैर्य और श्रम के पावन रंगों से भर दिया। यह कथा सिखाती है कि टूटी हुई चीजों और रिश्तों को फेंकना कायरता और असंवेदनशीलता है; धैर्यपूर्वक मरम्मत करने और संवारने की कला ही मनुष्य को वास्तविक संतोष, सृजन का आनंद और रिश्तों की अमर मजबूती प्रदान करती है।
विंध्याचल के घने वन में सैकड़ों वर्षों से खड़ा एक विशाल वटवृक्ष अनगिनत पक्षियों और जीवों को आश्रय, शीतलता और फल देता था। जब दावानल (जंगल की भयानक आग) ने वन को घेर लिया, तो सभी शक्तिशाली पशु-पक्षी प्राण बचाकर भाग खड़े हुए। परंतु उसी वृक्ष पर रहने वाली एक नन्हीं चिड़िया ने नदी से अपनी छोटी सी चोंच में बूँद-बूँद जल भरकर आग पर बरसाना आरंभ किया। गरुड़ देव के पूछने पर चिड़िया ने कहा—'जब इतिहास लिखा जाएगा, तो मेरा नाम आग लगाने वालों या भागने वालों में नहीं, आग बुझाने वालों में दर्ज होगा।' यह कथा सिखाती है कि साधन छोटे हों या बड़े, निष्ठा और समर्पण ही सबसे महान कर्म है।