पर्यावरण संरक्षण
शहर के ऐतिहासिक स्वतंत्रता सेनानी स्मृति पार्क में बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों के बैठने के लिए सागौन की लकड़ी और ढलवां लोहे (कास्ट आयरन) की मजबूत हेरिटेज बेंचें लगी हुई थीं। ग्यारहवीं कक्षा के चार बिगड़ैल और उपद्रवी छात्र—मयंक, विक्की, हर्ष और रोहन—शाम को पार्क में आते थे और अपनी ताकत का नशा दिखाने के लिए उन सरकारी बेंचों पर जूतों समेत कूदते, भारी पत्थर पटकते और उनके बोल्ट ढीले करते थे। जब मयंक ने एक दिन अपने दोस्तों को रोकने की कोशिश की, तो विक्की ने हंसते हुए कहा—'अरे डरपोक! यह सरकारी माल है, किसी के बाप की जागीर नहीं है; टूटेगी तो सरकार दूसरी लगा देगी, तुझे क्या दर्द हो रहा है?' उनकी इस बदमाशी के कारण पार्क की मुख्य छायादार बेंच की लकड़ी बीच से चटक गई और उसके लोहे के पेंच निकल गए। अगली सुबह जब अस्सी वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक पंडित दीनानाथ जी, जो हृदय रोगी थे और लाठी के सहारे पार्क में टहलने आते थे, थककर उस बेंच पर बैठे, तो वह टूटी हुई बेंच भयानक आवाज के साथ ढह गई। वृद्ध दीनानाथ जी सीधे नुकीले पत्थरों पर गिरे; उनका कूल्हा टूट गया और सिर से खून की धार बह निकली। मयंक उस समय पार्क के पास से गुजर रहा था। उसने जब उस असहाय वृद्ध को दर्द से तड़पते और एम्बुलेंस में ले जाते देखा, तो उसकी आत्मा काँप उठी—'सरकारी संपत्ति किसी लावारिस की नहीं, हम सबकी अपनी साझी धरोहर होती है; हमारे एक घटिया मजाक ने एक बेगुनाह बुजुर्ग की हड्डियाँ तोड़ दीं!' मयंक आत्मग्लानि की आग में जल उठा। उसने अपने पिता के सामने रोते हुए अपना अपराध स्वीकार किया। मयंक ने अपने तीनों दोस्तों को ललकारा और उन्हें उनके अपराध का बोध कराया। चारों ने मिलकर अपने छह महीने के पॉकेट मनी से नई मजबूत लकड़ी, लोहे के बोल्ट और पेंट खरीदा। उन्होंने पूरे एक सप्ताह तक पार्क में पसीना बहाकर न केवल उस टूटी बेंच की मरम्मत की, बल्कि पार्क की सभी बीस बेंचों को मजबूत करके नए रंग-रोगन से चमका दिया और उस पर लिख दिया—'यह आपकी अपनी धरोहर है, इसका सम्मान करें।' जब पंडित दीनानाथ जी अस्पताल से स्वस्थ होकर लौटे और उन्होंने उन युवाओं का यह प्रायश्चित देखा, तो उन्होंने उन्हें गले से लगा लिया। यह कथा सिखाती है कि सार्वजनिक संपत्ति पर हर नागरिक का साझा अधिकार और उसे सुरक्षित रखने का पवित्र कर्तव्य होता है; सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना अपने ही देश और समाज के साथ विश्वासघात है।